सोमवार, 29 अगस्त 2016

नेहा

आज अगर उनकी बेटी साथ होती तो उन्हें यूँ वृद्धाश्रम में नहीं छोड़ देती। वृद्धा श्रम में बैठी,  अनुराधा जी को आज  बरसों पुरानी नेहा की कही  बातें याद आ गई थी...

"मम्मी, आप देखना, जिसे आज वो दुत्कार रहे हैं, उसी बेटी पर एक दिन पापा को गर्व होगा।"

"मैं तो कुछ कर ना सकी, पर भगवान तुझे जरूर सफल बनाए।"

 स्वयं अनुराधा जी ने भी तो बेटी को प्रोत्साहन देते हुए कहा था।स्मृतिपटल पर एक एक करके अतीत के चित्र उभरते गए।

"नारी  सशक्तिकरण की आवश्यकता और उसके सामाजिक प्रभाव।"

क्लास के बोर्ड पर टापिक लिखने के बाद सामाजिक शास्त्र के प्रोफेसर कमलकांत ने  नाक पर आ गए चश्मे को उसकी जगह पहुँचाते हुए कहा।

"कल सबको अपना स्पीच तैयार करके आना है। क्लास के बाद दो  घंटे का सामाजिक विषयों  पर चर्चा सत्र होगा। स्वयं डाक्टर वी के अय्यर इसको जज करेंगे"

 इसी साल अपने सामाजिक कार्य के कारण नेशनल अवार्ड से सम्मानित अय्यर सर के सामाजिक कार्य और सहज व्यवहार से सभी परिचित थे।

"योर एटिट्युड विल मेक यू बिग (आपका विचार आपको एक दिन बड़ा बनाएगा)।"

अगले दिन  की चर्चा सत्र में  आवेश में आ गयी नेहा ने इतने जोरदार तरीके से अपनी बात रखी कि अय्यर सर ने उसकी खुले दिल से उसकी प्रशंसा की थी।

"मेरे जीवन में शांति और सुख मेरा बेटा ही लाएगा। बेटियाँ सिर्फ़ एक बोझ होती हैं, परायी सी। दहेज देकर शादी कर देने के बाद ही. उतारा जा सकता है। "

नेहा के पापा ने मम्मी को निशा की उपलब्धि बताने पर झुंझलाते हुए कहा था। नेहा की मम्मी और नेहा  को तो जैसे ये सब सुनने की आदत सी हो गई थी। नेहा  हर बार एसी बातों को  अनसुनी कर पापा के लिए हर वो कुछ कर दिखाने के लिए तैयार रहती थी, जिससे उनका हृदय परिवर्तन हो सके, पर आज पर्दे की ओट में छुपी नेहा पापा की यह उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर सकी।

"माँ मैंने हर बार पापा की नजरों में  एक आदर्श बेटी बनने कोशिश की, जबकि इसके विपरीत भैया ने तो कई बार  पापा को  ही कई बातें सुनाने में कसर नहीं छोड़ी है, फिर भी पापा उसे ही क्यों चाहते हैं? मेरा क्या अपराध है माँ?"

सुबकते हुए प्रश्न पुछते नेहा की निरीह आँखें माँ के चेहरे पर टिक गई।

"नारी जाति में जन्म होना ही सबसे बड़ा अपराध है, बेटी। समाज में तुम्हारे पापा जैसे कई कुंठित लोग मिल जाएंगे, जिन्हें बेटियाँ और बहनें बोझ लगती हैं।"

सुबकते बेटी को गले लगाकर कहते हुए माँ की आँखों से अंगारे बरस रहे थे। बरसों से मन के किसी कोने में  दबा दर्द आज यूँ अचानक छलक आया था, शायद आज नेहा बेटी कम और दोस्त ज्यादा लग रही थी।

"तेरे पापा ने हमेशा बेटा की ही कामना की थी।पहली संतान बेटी पैदा होने पर उनके सपनों के महल जैसे ढ़ह गए, महीनों  तक तेरा चेहरा नहीं देखा। अगर मैं  उस दिन मैं  गर्भ परिक्षण के लिए सशक्त रूप से मना नहीं कर देती, तो शायद तू आज इस दुनिया में ही ना होती।"

 बार बार की मनुहार और बहुत अनुनय विनय के बाद पति ने  घर में जगह तो दे दी थी पर स्पष्ट रूप से कहा था।

"घर में तो जगह दे रहा हूँ, पर दिल में कभी जगह नहीं मिलेगी।"

दो बरस बाद जन्में बेटे ने बेटी पैदा होने का दुःख कम तो जरूर कर दिया था, पर हमेशा के लिए  दुर ना कर सका। जहाँ बेटे को इंजीनियरिंग कालेज में एडमिशन दिलाते दिल बाग बाग हो रहा था, वहीं बेटी को पढाना भी बोझ लग रहा था।

"ज्यादा पढ़ कर क्या करेगी, कल को दूसरे ही घर जाएगी। हमारा बेटा तो हमारे पास रहेगा।  फालतु पैसे नहीं हैं मेरे पास। तुम्हें जो करना है करो।"

पापा ने दो टूक सुना दिया था। बेटी के नाम पर खर्चा जैसे पेट काटने बराबर लगता था। माँ ने अपने गहने  बेचकर नेहा को बी ए में एडमिशन दिला दिया था। उस दिन पापा के रूखे व्यवहार ने नेहा को बरबस अय्यर सर की वो बातें याद आ गई थी, जो उन्होंने सिर पर हाथ रखकर  आशीर्वाद देते हुए सेवा करने की नसीहत के साथ कहे थे, काश नेहा के पापा भी उनकी तरह होते! कितना सुख मिलता, जब दोनों मिलकर लोगों की वेदना दूर करने का प्रयत्न करते। स्वयं नेहा का दिल भी तो बहुत बड़ा था, तभी तो इतने दिन पापा के रूखे सूखे व्यवहार को यूँ झेल गई थी।

"माँ पापा, आप यहाँ इतने दिनों बाद यहाँ, मुझसे मिलने आयी है?"

वो चिरपरिचित आवाज अनुराधा जी को अतीत से बाहर निकल आने के लिए काफी था। उनकी बेटी नेहा को सामने देख आश्चर्य और सुख के मिश्रित भाव चेहरे पर उभर आये थे।

"आखिरकार पापा को मेरी याद आ ही गई। मैं ना कहती थी, कि पापा को एक दिन जरूर मुझ पर गर्व होगा"

माँ से गले मिलते,  नेहा की आवाज में गर्व का पुट था।

"तुम्हारे भैया और भाभी ने हमें हमेशा के लिए घर से निकालकर इस वृद्धाश्रम में डाल दिया है।"

अनुराधा जी ने सुबकते हुए बताया।

"पर बेटा तुम यहां कैसे? कहीं तुम भी अपने सास ससुर को यहाँ छोड़ने तो नहींआयी हो?"

"आपकी बेटी इतनी, घटिया नहीं हो सकती। आजीवन सेवा का संकल्प लेकर घर छोड़ा था मैंने, शादी का तो सवाल ही नहीं उठता, फिर सास ससुर कहाँ से आएँगे।आज भी  वही कर रही हूँ।  घर छोड़ने के बाद, अय्यर सर की मदद से यह वृद्ध आश्रम की शुरूआत की थी। आज मैं यहाँ पर संचालिका के रूप में काम कर रही हूँ, इन सारे बुजुर्गों से वही अपनापन और प्यार मिला है, जो आपसे मिलता रहा था।"

नेहा यह कहते हुए भावुक हो गई थी। अनुराधा जी ने हल्के से हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया था।

"पर, माँ ये तो बताओ, ये सब हुआ कैसे? पापा  तो भैया को बहुत चाहते थे। "

"हाँ पर तेरे भाई की शादी के बाद ६ महीने सब सठीक था, पर धीरे धीरे बहू ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए। शिकायतें और  झगड़े तो जैसे दिनचर्या का हिस्सा हो गया था। तेरा भाई तो अब अपने पापा की भी नहीं सुनता था, आखिरकार आज उनलोगों ने हमें यहाँ भेज दिया"

बताते हुए अनराधा जी की आँखों ने अनकहा दर्द भी बयां कर दिया था।

"चिंतित ना हो माँ, जब तक आपकी यह बेटी है, तब तक आपलोग अकेले नहीं है। पापा आप दोनों मेरे साथ चलिए।"

कहते हुए पापा का हाथ पकड़ कर उठा रही नेहा को पहली बार उसके पापा ने प्यार से अपने पास बिठाया था।

"मैं वो जौहरी हूँ, जिसने पत्थर को हीरा समझा और हीरे को पत्थर। मैं अंधा था, अनु जो बेटी के प्यार और दुलार को समझ नहीं सका। जिस बेटे को जिंदगी भर चाहा, उसने दुत्कार दिया, और नेहा जिसे मैंने कभी दिल से नहीं अपनाया था, आज वही बेटी हमारा सहारा बन रही है। सचमुच, सौभाग्य से ही ऐसी बेटी मिलती है ऐ अनु। आज इतने वर्षों बाद मैं समझ पाया हूँ, बेटी अगर नेहा जैसी हो, तो बोझ नहीं बल्कि घर का मान और सम्मान होती हैं। आज से मैं भी अपनी बेटी के साथ मिलकर सेवाकार्य करूँगा।"

नेहा के पापा की आँखों में पश्चाताप के आँसू, नेहा के प्रति सम्मान और गर्व के प्रतीक बन कर छलक रहे थे...









सोमवार, 16 मई 2016

सेवा

कहीं अनाथ हुआ बालक, कहीं भुख से बिलबिलाते हजारों लोग, कहीं एक दूसरे की आंखों में अपनों को परिवार को ढूँढते पहचानते परिजन, कहीं रो रो कर सूख गयी पथरायी आँखे, अपने महाविनाश का सबूत, अपने पीछे छोड़ सुनामी चली गई थी | आस पास का सारा जीवन अस्त व्यस्त था।
कई सरकारी अफसर, डाक्टर अपने सुख आराम छोड़, जीवन को पटरी पर लाने की कोशिश में लगे थे। हजारों समाजसेवी संगठन दान देने की अपील करते, लोगों की सेवा में जी जान से जुटे हुए, अपनी एकता और सद्भाव का परिचय दे रहे थे। पुरे देश से भोजन, पानी, कपड़े, दवा आदि रोजमर्रा की वस्तुएँ एकत्र की जा रही थीं ।
शाम का समय था, जब ऐसा ही एक संगठनदिल्ली के एक व्यस्त इलाके में आगे आकर दान करने की अपील कर रहा था।

"जाओ बाबा, अभी हमें आपको देने के लिए पैसे नहीं हैं, ये तो हम उन लोगों के लिए पैसे जमा कर रहे हैं, जो सुनामी के आए विनाश से पिड़ित हैं।"

अचानक एक अधेड़ उम्र का भिखारी को उनके पास आया देख एक कार्यकर्ता झुंझलाते हुए बोल पड़ा। दान करने के अपील के लिए लायी हुई माइक पास होने की वजह से,  कार्यकर्ता के झुंझलाहट भरे शब्दों ने अनेक लोगों का  ध्यान उस ओर आकर्षित किया था|

"यही सुनकर तो आया हूँ। अधेड़ जरूर हो गया हूँ, पर सब समझता हूँ।"

कहते हुए अपने फटे कुर्ते की जेब से आज भीख में लायी सारी कमाई उस दान पात्र में डालकर, लाठी खटखटाते चले गए। जाते जाते अपने पीछे, गार्डन में घूमते, रेस्तराँ में पिज्जा खाते , मुवी टिकट के लिए लाइन में लगाते अनेक लोगों को सेवा की परिभाषा बतला गए थे।

शुक्रवार, 13 मई 2016

चस्का फेसबुक का

दुनिया में कुछ हम जैसे प्राणी भी होते हैं, जिन्हें कभी भी मेहनत नहीं करनी पड़ती है सोने के लिए। निंद्रा देवी की असीम अनुकम्पा रहती है। उनके लिए सोना, सोने-चाँदी से भी बहुमूल्य होता है, जब मौका मिला नहीं कि सो गए, जैसे जीवन में पुण्य कमाने का यही एकमेव तरीका बताया है इश्वर ने।

यूँ तो हमारी नायिका को भी निंद्रा देवी की ऐसे ही कृपा प्राप्त थी, पर आज निंद्रा रानी, किसी नयी नवेली दुल्हन की तरह नखरे दिखा रही थी या फिर किसी कारण वश अपने इस अनन्य भक्त से रूष्ट हो गई थी।

अबकी बार सो जाने का निश्चय करते हुए दोनों आँखों को भींच कर बंद कर लिया था। पिछले दो घंटे से सोने के सारे उपाय आजमा कर देख लिए थे, आधे घंटे के कसमकस के बाद भी जब निंद्रा देवी ने दया नहीं दिखाई तो, बत्ती जलाकर फेसबुक आन करके बैठ गयी। दुनिया भर में कैसा भी गम हो, फेसबुक पर निर्झर झरने की तरह कलकल करता विचारों और ज्ञान का प्रवाह अविरल रूप से प्रवाहित होता रहता है। अकेलेपन की व्यक्तिगत समस्या से लेकर देश की गरीबी जैसी व्यापक समस्याओं से काल्पनिक रूप से निजात दिलाने वाले समाज सुघारक और चिंतकों की बारात जरूर उपलब्ध हो जाएगी।

कुछ लोग तो मनीषा कोईराला टाइप भूली बिसरी हीरोइनों का चित्र प्रोफाइल पिक्चर पर लगा कर असीम शांति और सुख का अनुभव करते हैं, मानों उनका उद्धार कर दिया हो। सागर की लहरों की तरह उभरते नये जमाने के विचारों, और पी. जे. की आयी बाढ़ को पढ़ते और शेयर करते वक्त का पता ही नहीं चलता है।

अपनी नायिका का ही उदाहरण ले लेते हैं। चाहे गरमी की छुट्टियां हो या एग्जाम फिवर मोहतरमा तो फेसबुक फीवर से ही ग्रसित है। नींद से छुट्टियां पाते ही नये मोबाइल एस ३ के साथ बन जाती है फेसबुकिया समाजसुधारक । नये पीढ़ी के स्मार्ट फोन की नई फसल ने तो मानों सारे गुड़ गोबर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, वरना हमारे जमाने में तो एस३ ट्रेन के कोच पर लिखे होते थे।

आजकल तो प्यार का भूत भी फेसबुक पर ही चढ़ता है। हजारों लाखों की संख्या में युवा एक दूसरे से मन भर चैटियाते रहते हैं। प्यार की कबड्डी फेसबुक के मैदान पर खेलकर जीतने की कोशिश में कई शहीद होकर बर्बाद भी हो जाते हैं। कुछ लोग तो हमारी नायिका की तरह होते हैं, बड़े ही आवारा और फोकटिया किस्म के लड़के, जिन्हें कभी कोई लड़की घास नहीं डालती है। ऐसे लोगों को फेसबुक पर किसी सुंदर माडल का फोटो प्रोफाईल पिक्चर सेट कर, कोई सुंदर सा लड़की का नाम रखकर, स्त्री चरित्र की चादर ओढ़े, आए दिन रोमियो बने आशिकों के साथ चुहलबाजी करते इनको बड़ा मज़ा आता है। प्यार की एक बूँद को तरसते इन आनलाइन रोमियो को यूँ चकमा देकर मानों प्रेम की ए. बी. सी. मे हुए हार का बदला ले कर जीत मे बदल रहे हों।

कुल मिलाकर अगर हमारी आज की काल्पनिक फेसबुकिया नायिका की तरह लोग अपना समय फोेसबुक और व्हाट्स अप पर लुटाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब आई. आई. टी. एम. जैसी प्रसिद्ध प्रबंधन संस्थान, मानव संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में "फेसबुक और व्हाटस अप" जैसे मैसेंजर से नफरत करने का नया अध्याय जोडकर और इंटरनेट के इस भँवर में जीवन बर्बाद कर रहे युवा पीढ़ी को एक अवतार की तरह बचा रहे होंगे।

मंगलवार, 10 मई 2016

सात साल बाद


"हाय ! काफी सालों बाद तुमसे बात हो रही है। कैसे हो?"
फेसबुक खोलते ही निशा का मैसेज पौप अप हुआ था। अभी कुछ ही दिनों पहले निशा की फ्रैंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट की थी।
राज : "यूँ इतने दिनों बाद, अचानक मेरी याद कैसे आ गई?"
निशा : "इडियट, याद तो हमेशा तुम्हारी आती थी, पर तुम ही मुँह छुपा जाने कहाँ चले गए थे।"
निशा : "तुम्हारे शहर में मेरा ट्रांस्फ़र हुआ है।"
निशा सरकार, एसेसिएट मैनेजर, आई केयर. राज ने उसके प्रोफाइल पढ़ते समय देखा था।
राज : "तुम पढ़ाकू तो थी ही, पर जाब करोगी ये बात हजम नहीं हो रही है। तुम्हारे घर वालों ने इजाजत दे दी?"
निशा : "कल मिलो, तो बताती हूँ।कहाँ मिलेंगे?"
राज : "रघुलीला माल, कैफे कोफी डे, ५ बजे?"
निशा: "ओके बाय, गुडनाइट। :)"
राज की निशा से चैटिंग तो बंद हो गई थी, पर पूरे सात सालों के बाद निशा के सथ हुए चैट ने पुरानी यादों को ताजा कर दिया था, जिसे उसने कभी अतीत के समुंदर में हमेशा के लिए विसर्जित कर दिया था।

निशा से पहली मुलाकात कालेज की कैंटीन में हुई थी और पहली ही मुलाकात में उसे प्यार का इज़हार करने वाले वो तीन जादुई शब्द कहने वाला था। नहीं नहीं, राज कतई फ्लर्ट नहीं कर रहा था, वो तो उसे सिनियर्स की रैगिंग की वजह से करना पड़ रहा था। उन दिनों रैगिंग करके जूनियर्स को परेशान करना एक फैशन था।

यूँ तो निशा को मन ही मन चाहने वालों की कमी नहीं थी पर उसे प्रपोज करने की हिम्मत जुटाने का मतलब कुल्हाड़ी पर पैर मारने के बराबर था। निशा के सनकी और बद्दिमाग भाई से पुरा कालेज परिचित था। सबके सामने उसने सिर्फ इसलिए एक लड़के को पीट पीटकर उसकी हड्डी पसली एक कर द, क्योंकि उसके दोस्त की बहन को प्रपोज करते उसे देख लिया था उसने।कुल मिलाकर राज को पिटवाने की पूरी तैयारी कर ली थी उसके सिनियर्स ने।

"एक्सक्यूज मी"
इस बात से अनभिज्ञ राज, निशा के पास पहुँच उसे दोस्तों के साथ हँसते हुए देख कहा था।
"यस, कहिए"
"आइए सर, रामू , सर के लिए उनका स्पेशल चाय दे।"
इससे पहले कि राज मुँह खोलता, हिन्दी के प्रोफेसर रमाकांत को आते देख कैंटीन स्वामी ने जोर से आवाज दी थी। प्रोफेसर को आते देख, सिनियर्स ने चुपचाप पतली गली पकड़कर निकलने में ही भलाई समझी।
"जी.. जी.. मैं.. मेर मतलब..."
"हाँ, आप यहाँ बैठे सकते हैं। क्या आपको सिनियर्स ने यहाँ भेजा है?"
निशा ने सिचुएशन को सम्हालते हुए धीरे से पूछा था। निशा की हिरणी जैसी बड़ी और पारखी अाँखों ने राज के चेहरे पर आए सिकन, और रैगिंग के लिए कुख्यात सिनियर्स के ग्रुप का प्रोफेसर के आते ही चुपचाप खिसक लेने का वो दृश्य दोनों कैद कर लिया था।
"थैंक्स, पर आपको कैसे पता चला?" आश्चर्य और धन्यवाद के मिश्रित भाव से राज के गोल हुए होंठ खुले ही रह गए।
"आप अभी कॉलेज में नए हैं, थोड़े ही दिनों में ये सब समझ जाएंगे।" 
बोलते हुए निशा के चेहरे से गर्व छलक आया था।
"और हाँ जितना हो सके मुझसे दूर रहिए। हर बार मैं शायद आपकी मदद ना कर पांऊ"
सलाह देते हुए, राज को असमंजस में छोड़, निशा अपने दोस्तों के साथ चली गई थी। बेचारा राज अपने मददगार का नाम भी नहीं पूछ पाया था।
"पहले दिन की शुरुआत बहुत ही अप्रत्याशित हुई थी, पर जो भी हो, उसका प्रेजेंस औफ माइंड कमाल का है, पर उसने दूर रहने की बात क्यों कही?"
देर रात ये सब सोचते हुए, नींद ने कब उसे अपने आगोश में लिया पता ही नहीं चला। सुबह कालेज में जब दोस्तों से पता चला तो फिर एक क्लास में होते हुए भी कभी बातें करने की कोशिश नहीं की।
 
"आप तो बड़े छुपे रूस्तम निकले, क्लास में प्रथम आने पर दिल से बधाई । जनाब को कालेज में तो कभी पढाई के लिए सिरियस नहीं देखा।"

निशा ने हाथ मिलाकर बधाई दी थी। क्लास में मजाक मस्ती और हाजिरजबाबी के लिए तो उसे सभी जानते थे, पर हर एक्टिविटी में अव्वल रहने वाला राज पढ़ाई में भी बाजी मार लेगा इसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी।

"धन्यवाद! क्यूँ मौज मस्ती करते हुए पढ़ाई नहीं की जा सकती?"

पूछते हुए राज की आखें उससे दगा करते हुए निशा के चेहरे पर टिक सी गयी थी।

"आपको पता है, आज तक क्लास मे निशा ही फर्स्ट आती रही है।"

निशा के पास खड़ी सहेली ने ना जाने क्यों, ये बताना जरूरी समझा।

"फिर तो मुझे सारी बोलना पड़ेगा"

राज के कान पकड़कर बोलने के नाटकीय अंदाज पर दोनों सहेलियाँ हँस पड़ी थी।

"नहीं ऐसी बात नहीं है, पर मुझे बस कैमिस्ट्री उतनी समझ नहीं आती, वरना आपको सारी बोलने का मोका नहीं मिलता।"

"आपको समझने की क्या जरूरत है? मैंने तो सुना है, जो समझ नहीं आता है, उसे लड़कियाँ याद कर लिया करती हैं।"
राज ने व्यंग्य का पुट देते हुए कहा था।

"सब लड़कियाँ एक जैसी नहीं होती हैं।"

"अगर ऐसी बात है, और आपको व आपके भाई को आपत्ति ना हो, तो हम आपको कैमिस्ट्री सिखा दिया करेंगे"

राज ने चैलेंज स्वीकार करते हुए अपने बड़े दिल का परिचय दिया था।

"सच, आप हमें सिखाएंगे? भाई को मैं समझा दूँगी"

निशा ने अविश्वास दिखाते इतने जल्दी में कह डाला था, जैसे की एक पल की देरी होती तो राज सिखाने वाली बात से मुकर जाता।

"जरूर पर मुझे आप नहीं तुम कहना पड़ेगा। हम अच्छे दोस्त रहेंगे।"

फिर तो अक्सर कालेज खत्म होते ही कालेज की लाइब्रेरी में दिन बीत जाता था।
समय पंख लगा कर उड़ा जा रहा था, जल्द ही कॉलेज की परीक्षा एक बार फिर से शुरू हो गई थी।
इस बार सच में निशा ने राजेश से चार नंबर अधिक पाकर उसे सारी कहने का मौका नहीं दिया था।
"तुमने तो अपना कहा सिद्ध कर दिया है, प्रथम आने पर बधाई"

"धन्यवाद, पर इस बधाई पर तुम्हारा भी हक है, तुम्हारे सिखाए बिना ये मैं कैसे कर पाती?"
कहते हुए निशा के चेहरे पर हल्की लालिमा आ गई थी। केमिस्ट्री सिखते सिखाते, कॉलेज की लाइब्रेरी, कैंटिन, क्लासरूम उनकी पनपती हुई लव केमिस्ट्री के साक्षी बनने लगे थे। ऐसा नहीं है कि प्यार की ये तपिस निशा तक नहीं पहुँची थी, पर वो परिवार के खिलाफ कतई नहीं जा सकती थीं, शायद इतने दिनों साथ रहकर राज यह समझ चुका था, इसलिए राज ने कभी प्रत्यक्ष रूप से कभी पहल भी नहीं की थी।

"राज, मेरी शादी पक्की हो चुकी है, पहला कार्ड तुम्हें दे रही हूँ, तुम आओगे ना?"

कार्ड थमाते हुए उसकी हिरणी सी आँखे राज के चेहरे पर निबद्ध थी।

जवाब में राज ने आँखें झुका ली थी। उसके बाद निशा चाहकर भी वहाँ रूक नहीं पायी थी।
निशा की शादी की खबर सुनते ही वो जैसे कहीं खो गया था। वो मस्ती, वो साथी, वो शहर सब पीछे छुट गए थे। रह गया था, तो आज का गम्भीर और संजीदा राज

यूँ तो राज की हर सुबह की शुरुआत योग और मंगल मंत्रों के साथ होती थी, पर रात देर सोने की वजह से आज की सुबह उसके नींद ने हजम कर लिया था। इतने दिनों बाद निशा कैसी दिखती होगी? उसका सामना वो कैसे करेगा, क्या बातें होंगी, हो भी पाएँगी या नहीं, सोचते हुए कब शाम के चार बज गये पता नहीं चला।

आदतन अपने समय से पहँचकर कैफे काफी डे के उस कार्नर की टेबल पर बैठा राज बाहर के आते जाते लोंगों में अपने सवालों के जवाब ढूँढने की कोशिश कर रहा था, कि निशा आती दिखी।

वही कमर तक लम्बे बाल, हिरणी जैसी अाँखों के बीच काली छोटी सी बिंदी, उँची गोल नाक के नीचे पतले होंठ पर उसकी फेवरेट हल्की गुलाबी लिपस्टिक और हमेशा की तरह मुस्कराता चेहरा, कुछ भी तो नहीं बदला था इन सात सालों में।  
कान से लटकते छोटे छोटे झुमके, मानों पूरी जिंदगी साथ लटके रहने का सीख दे रहे थे।

"राज तुम तो बहुत बदले बदले से लग रहे हो, धीर गंभीर इतना सिरियस मैनें तुम्हें कभी नहीं देखा है।"
निशा ने बैठते हुए कहा था। राज की आंखों पर लगे चश्मे ने चेहरे पर छाये गंभीरता को दोगुना कर दिया था।

"छोड़ो इन बातों को, बताओ कैसी हो?और जाब पर कब से हो?"

"अरे, अभी तो आई हूँ, थोड़ा वक्त दो"

राज को जैसे अपनी गलती का अहसास हुआ, दो कैपेचिनो और ग्रिल सैंडविच का आर्डर देकर जब वह वापस आया तो चेहरे पर शांति थी , पर शायद यह सवाल उसे अंदर तक परेशान कर रहा था,

काफी सिप करते हुए, निशा ने बताया, कि कैसे शादी के बाद ससुराल वालों ने उसे घर मे ही कैदी बना लिया था। पहली ही रात उसकी स्थिति स्पष्ट हो गई थी।

"रस्साली, एकदम ठंडी औरत है, पति को कैसे खुश करते हैं, पता नहीं।"

नशे में धुत्त पति पुरे जोर से दुत्कारते हुए बाजारू औरत चंदा के पास चला गया था। मनमोहक प्रथम रात्रि की ऐसी विभत्स कल्पना तो नहीं की थी ना।

"जाने कैसी कुल्लछिनी है? अपने पति को एक दिन भी अपने साथ बाँध कर नहीं रख पायी"
"और नहीं तो क्या, लगता है, मायके का भूत उतरा नहीं है सर से"

सास और जेठानी दोनों जैसे ताना देने में काम्पीटिशन कर रहे हों।
रोज के ताने और नशे में धुत्त पति की गालियां सुनती निशा शायद अपने परिवार से किए वादा अदायगी की सजा चुपचाप भुगत रही थी।

"नशे में धुत्त पति के एक्सिडेंट में हुए मौत ने ससुराल में मेरा दाना पानी बंद करवा दिया था। सासु और जेठानी ने उसी समय मुझे घर से निकाल बाहर का रास्ता दिखाया था। पास की महिला समाजसेवी अंजलि श्रीवास्तव ने मेरी मदद की थी।"

"भाई और पापा को खबर क्यों नहीं किया निशा?" राज ने हाथ थामते हुए पूछा था।
 
"भाई और पापा ने तो मेरी शादी करवा कर मुक्ति पा ली थी, शुरू से यही कहा और सिखाया, चाहे कुछ भी हो शादी के बाद मायका पराया ही होता है, ससुराल में ही अपनापन ढूँढने की कोशिश करो। उनके साथ नहीं जाना चाहती थी।"

"अंजलि श्रीवास्तव की मदद से मैने अपना पहला जाब शुरू कर दिया था। आज पुरे चार साल बाद आज जो हूँ, तुम्हारे सामने हूँ।"

"तुम्हें मेरी याद इतने दिनों बाद आयी? पहले क्यों नहीं बताया ऐ निशा?"

"जिस हाल में मैंनें तुम्हें छोड़ दिया था, उसके बाद मैं तुम्हारा सामना कैसे कर पाती राज?सच पूछो तो, इतने दिनों में एक तुम्हारी ही तो याद आयी थी। हिकारत भरी नजरों और तानों ने मुझे अपनी नजरों में गिरा दिया था। तुम्हारी प्रेरणा और मिसेज श्रीवास्तव की मदद से ही तो आज यहाँ तक पहुँच पायी हूँ।"

"एक बार तुम्हें जाने देने की गलती कर दी थी। पर आज ये गलती दुबारा नहीं दुहराऊंगा।"

 दो मिनट के मौन के बाद, राज ने घुटनों के बल बैठकर चिरपरिचित अंदाज में, वर्षों से अपने दिल के किसी कोने में दबाए प्यार का इजहार किया था।

"आई लव यू। विल यू मैरी मी मिस निशा सरकार?"

 कहीं अटका हुआ रैगिंग के चक्कर में मजबूरीवश कहे जाने वाले प्यार के वो जादुई तीन शब्दों की मिठास, आज सात सालों के बाद निशा के कानों में शहद की तरह घुले जा रहे थे..।

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

अकस्मात्

उस दिन काफी खुश थी वो, और खुश हो भी क्यों नहीं, एक तो उसे मनपसंद यूनिवर्सिटी में पी. एच. डी. की स्कालरशिप मिल गई थी और उपर से राजेश पूरे दो साल की ट्रेनिंग के बाद छुट्टी पर आया था । जल्दी से घर के सारे काम निपटाकर आलमारी से अपना फेवरेट वाला पिंक सूट निकला था। जल्दी जल्दी तैयार होकर अपने आप को एक बार मिरर में देखा। घुंघराले काले बालों पर गोल्डन कलर का हेअर पिन, काली बड़ी आँखों के बीच में छोटी सी बिंदी, गुलाबी रंग की लिपस्टिक से सजे होंठ , बला की खूबसूरती पर इतराती हुई, घर से निकल ही रही थी कि उसे याद आया कि राजेश के लिए तो उसने कुछ गिफ्ट भी नहीं ली है। इतने दिनों बाद मिलने वाला है, एक गिफ्ट तो बनता है।

"भैया, क्रास वर्ड ले चलो जल्दी"

रिक्शा पर बैठते ही उसने कहा था, सालों के इंतजार के बाद जैसे ये एक घंटा बहुत भारी पड़ रहा था, वो समय से भी तेज उड़कर अपने राजेश के पास पहुँच जाना चाहती थी। पांच मिनट बाद रोमांटिक सेक्शन में एक के बाद एक किताब देखते हुए उसकी नजरें पुष्पा सक्सेना की लिखी हुई किताब "सूर्यास्त के बादपर टिक गई। 
 
"पता है, मुझे रोमांटिक कहानियाँ पढ़ना बहुत पसंद है, और कहानी अगर डॉक्टर पुष्पा सक्सेना जी की लिखी हों तो पढ़ने का मज़ा दोगुना हो जाता है।"

उसे राजेश की कही ये बात अचानक याद हो आई थी। वैसे तो उसे रोमांटिक कहानियाँ पढ़ने का कोई खास शौक नहीं था, पर हाँ, राजेश जब वही कहानियाँ उसे सुनाता था, तो वो कहानियाँ में इस कदर खो जाती थी जैसे खुद हर कहानी की नायिका हो और राजेश उसका नायक। 
 
बुक गिफ्ट पैक करवाते उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव उभर आये थे, उसे पता था, इससे अच्छा गिफ्ट राजेश के लिए हो नहीं सकता, आखिर इतने दिनों की ट्रेनिंग में वयस्त उसे ये सब पढ़ने का मौका कहाँ मिला होगा।

कुछ ही देर बाद वो वृंदावन पार्क में उसी पेड़ के नीचे बैठी थी, जहां न जाने कितने ही शाम दोंनों ने एक साथ गुजारे थे। शाम का समय थे। राजेश अभी आया नहीं था । कालेज से छुटने के बाद न जाने कितने प्रेमी जोड़े की शाम इसी पार्क में बीत जाया करती थी । राजेश से उसकी पहली मुलाकात भी तो यही हुई थी।

"एक्सक्यूज मी, मे आई हेल्प यू?"

ऊँची डाल पर लगे कनेल का फूल तोड़ने की कोशिश करते देख एक लड़के ने उससे कहा था। 
 
"नो थैंक्स, आई कैन मैनेज इट"

कहकर वो फिर से फूल तोड़ने में वयस्त हो गई थी। तीन चार बार की कोशिश के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा, वो लड़का वही कुर्सी पर बैठा उसे देख रहा था। इस बार मुस्कराते हुए बिना पूछे, फूल तोड़कर उसके हाथों पर रख दिया और कहा

"इस उम्र में तो लड़कियाँ गुलाब के फूलों की दिवानी होती हैं"

"मुझे कनेल के फूल बहोत पसंद है, मेरी मां के जाने के बाद हर सुबह मेरे बाबा मेरे लिए यह फूल ले आते थे"
फूल लेकर ये बोलते हुए उसकी आँखें पनीली हो गई।

"आय एम सारी, मुझे पता नहीं था, आपके मां बाबा नहीं है।"

"इट्स ओ. के.। वैसे तो ये बात तो मैं किसी से बताती नहीं, पर पता नहीं क्यों आपके पूछने पर अपने आप को रोक नहीं पाई।

 "बाइ द वे, थैंक्स फॉर योर हेल्प।"
"यू आर वेलकम, अब मुझे जाना होगा"

मुस्कराते हुए कहकर वो पार्क की छोटी सी दिवार फलांगता गायब हो गया। कुछ दिनों बाद कालेज की लाइब्रेरी में किताब ढूँढती उसकी नजर बुक इशु कराते उस लड़के पर पड़ी।

"हाय, उस दिन आप अचानक चले गये थोे, मैं आपका नाम भी नहीं पूछ सकी थी। आप भी इसी कालेज में पढ़ते हैं?"

"मैं राजेश हूँ, और मैं यहाँ पर इतिहास विभाग में इंटर्नशिप कर रहा हूँ। दो महीने पहले ही ज्वाइन किया है
उसे देख कर मुस्कराते हुए जवाब दिया था उसने।

फिर तो अक्सर मुलाकात होने लगी, उसके नीरस और अकेलेपन की दुनिया में, राजेश उसके सुख दुःख का साथी बन गया था । कब ये दोस्ती, और दोस्ती प्यार में बदल गई पता ही नहीं चला। खयालों में खोई हुई उसकी तंद्रा अचानक आए फोन के आवाज से भंग हुई। राजेश का नंबर मोबाइल स्क्रीन पर फ्लैश होता देख खुशी से चहकते हुए फोन उठाया 
 
"आप जल्दी से सिटी हॉस्पिटल आ जाइए, मिस्टर राजेश का एक्सिडेंट हो गया है। नशे में धुत ड्राइवर ट्रक की स्पीड कंट्रोल नहीं कर पाया था, सिग्नल तोड़ते हुए बाइक के साथ टकरा गया था।"

उस पर तो जैसे वज्रपाात हुआ था, चेहरे की खुशी काफूर हो गई थी। मां बाबा के जाने के बाद उसकी दुनिया राजेश की इर्द गिर्द ही बस गई थी, पर लग रहा था विधाता ने जैसे उसकी झोली में सुख से कहीं ज्यादा दुःख ही दिए थे। कुछ वर्षों पहले पापा की ऐसी ही एक एक्सीडेंट दुर्घटना मे हुए निधन की याद ने अचानक उसे चैतन्य किया था। 
 
"नहीं इस बार नहीं" बुदबुदाते हुए बिजली की गति से पार्क के गेट से बाहर निकल गई थी।

"ऐसे दुःख की घड़ी में लोंगों को रोते हारते देखा है, "आप काफी बोल्ड और प्रैक्टिकल लड़की हैं"

हास्पिटल के रिसेप्सन पर, राजेश की हालत पूछते उसके संयमित और विश्वास भरे भाव देखकर पास बैठे नर्स ने उसकी सराहना की थी।

शायद उसे अभी भी इश्वर पर भरोसा था, या माँ पिताजी के आकस्मिक निधन ने उसे ऐसी परिस्थितियों से निपटने की शक्ति दे दी थी। आपरेशन थिएटर के बाहर ईजी चेयर पर बैठी छत ताकती हुई एकदम शिथिल सी लग रही थी, मानों ईश्वर से राजेश की सलामती के लिए तपस्या कर रही हो।

"आखिरकार आपका विश्वास जीत गया। राजेश अब खतरे से बाहर है।"

करीब साढ़े तीन घंटे बाद रिसेप्सन वाली नर्स ने उसके कंधे पर हाथ रखकर सूचित किया था।

" इतने बड़े एक्सीडेंट के बाद बच जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। आप उसे दस दिनों में घर ले जा सकती हैं, पर पुरे दो महीने तक हर सप्ताह चेक अप के लिए आना पड़ेगा।"

पास खड़े डॉक्टर ने बताया। उसने अश्रुपुरित नयनों से डॉक्टर की ओर देखा। ईश्वर और डॉक्टर के प्रति धन्यवाद के रूप में उसकी आँखों से दो मोती गालों पर लुढ़क आए थे।

शायद विधाता से भी उसका और दुःख देखा नहीं गया। एकबार फिर उसकी अँधकार होती जिंदगी, आशा और विश्वास की किरणों से जगमगा रही थी।








गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

यादों के पन्ने

हर दिन की तरह आज की सुबह की शुरुआत भी लेट से हुई थी।उठते ही पापा की आवाज कानों में सुनाई दी
"अरे! आज तो जलदी उठ जाओ".

पीछे से छोटे भाई ने भी सुर में सुर मिलाया,

"कितना आलसी है। अरे जल्दी से तैयार हो जाओ, लड़की देखने नहीं जाना है?"

आँखें मलता हुआ मैं बिस्तर छोड़कर उठा ही था कि अपने घर के सोनू निगम का गाना सुनाई दिया मुझे देखते ही गाना बदलकर कब लता मंगेशकर बन गया पता ही नहीं चला।
"आजकल पाँव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे"
पर आज तो उसका यूँ चिढ़ाना भी अच्छा लग रहा था।ऐसा नहीं है, कि हम पहली बार किसी लड़की को देखने जा रहे थे, पर इस बार की बात ही अलग थी। खैर दिल के उमंग को दिमाग रूपी जेल में कैद कर, मैने धरती पर पैर रखे ही थे कि भाई साहब ने अपनी सख्त हिदायत दे डाली।
"दाढ़ी वाढ़ी बना लेना, और अच्छे से तैयार हो कर चलना और हाँ जूते जरूर पॉलिश कर लेना "
शायद मेरे रोज का अनमने ढंग से तैयार हो कर ऑफिस जाने का दृश्य उसकी आँखों के सामने आ गया था।यूँ सुबह सुबह जग कर जल्दी से तैयार हो कर भागते हुए ऑफिस जाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा था।

"कितना अच्छा होता, अगर ऑफिस का काम घर से कर पाता"

 मैं अक्सर सोचा करता।आज बहुत दिनों बाद, शायद पहली बार, उसकी इस हिदायत भरे लहजे से मुझे हँसी आ रही थी उसे क्या पता था, कि मैं कितना उत्साहित और आतुर था इस मिलन के लिए। वैसे तो मिलने का समय तो ३ बजे का था, पर मेरी तैयारी तो सुबह से ही शुरू हो गई थी। दोपहर का खाना खा कर आराम करने के लिए बैठे ही थे कि, आशीष का फोन आ गया।
"आप लोग कितने देर में आ रहे हैं?"

अरे हां, आशीष के बारे में तो बताना ही भूल गया। मेरे दूर के वाले चाचाजी का लड़का, दूर का तो सिर्फ कहने का था पर असल में मेरी उससे बहुत पटती थी। एक बार रिश्ता हो जाए, तो हमारा साल में कम से कम एक बार तो मिलना तय था, आखिर लड़की वाले भी के ही तो थे। बस इसी बात की आस थी में वो भी लड़की वालों के साथ मुंबई आया था। हम करीब साढे तीन बजे वहाँ पहुँच गए थे। बात चीत और नाश्ता पानी के दौर के बाद आखिरकार मिलन की वो घड़ी आ ही गई।
लड़की को देखने के बाद लग रहा था, अगर जमाना १९वी सदी का होता, और केवल लड़की की फोटो देखकर शादी करनी पड़ती तो शायद आज तक मेरी शादी नहीं हुई होती, ऐसा लग रहा था कि रात भर बीबी से हुए झगड़े का सारा गुस्सा, स्टूडियो वाले ने लड़की की फोटो पर निकाला था। 
 
हम बिलकुल आमने सामने बैठे थे। मैनें धीरे से नजरें उठाकर देखा, हल्के हरे और प्याजी कलर के सलवार सूट में बड़ी प्यारी गुड़िया सी दिख रही थी। वो झुकी हुई नजरें, और हल्के गुलाबी कलर की लिपस्टिक से सजे होंठ उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे।कुल मिलाकर अपने आप में सिमटी, शरमायी और शायद थोड़ी सी घबरायी हुई सी साक्षात शरम और हया की मूरत नजर आ रही थी। अभी मैं ठीक से उसके मनभावन रूप का दिदार भी नहीं कर पाया था कि, फूफाजी जी की रोबदार आवाज ने जैसे मुझे सपनों की दुनिया से यथार्थ के धरातल पर ला पटका। फिर क्या, शुरू हो गया सवाल जबाब का सिलसिला, मै बड़े ही ध्यान से उसका जबाब सुन कर अपने सपनों की सुंदर, सुलझी और बेबाक लड़की से मैचिंग करता रहा। कुछ समय बाद मम्मी मेरी ओर देखकर बोली
" तुम्हें भी जो कुछ जानना पूछना है पूछ लो, शरमाओ मत"

"मेरे पास तो प्रश्नों की पुरी एक लिस्ट ही है, पर सबसे अंत मे पूछेंगे"

मेरा जबाब सुनकर सब हँस पड़े। लड़की थोड़ी सी डर गयी थी, मैंने चुपके से नोटिस किया।

"पहले आप हमसे जो जानना पूछना चाहते हैं, पूछ लीजिए"

मैंने कहा और उसे कम्फर्टेबल फील़ कराने की कोशिश की, वो कितना कम्फर्टेबल फील कर रही थी, उसका तो पता नहीं, पर हाँ उसकी छोटी और प्यारी सी स्माइल ने मुझे उसकी ओर दखने के लिए मज़बूर जरूर कर दिया था, शायद बड़े भैया ने भी उसकी असहजता भाँप ली थी, सो कहने लगे

"अरे हां, जो पूछना चाहती हो पूछ लो, इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। शरमाओ मत, सब अपने ही लोग हैं।"

पर उसने तो जैसे मौन व्रत ही रख लिया था, या फिर शायद वो इन सब बातों के लिए तैयार नहीं थी। उसने धीरे से अपनी मां की ओर देखा, कोई ईशारा ना पाकर चुपचाप नजरें झुकाए बैठी रही। कोई बात नहीं बनता देखकर मैंने ही बात शुरू की।उनके थोड़े ही सवालों के जवाब से मेरे दिमाग की ट्यूब लाइट ने ग्रीन सिग्नल देना शुरू कर दिया था, लिहाजा ४-५ सवाल जवाब के बाद ही मैं अपनी तरफ से श्योर हो चुका था, अब तो बस उसके मन की बात जानना था। इसी उधेड़बुन में था कि फूफाजी ने मेरे मन की बात कही

"चलिए, हम बड़े लोग दूसरे कमरे में चलते हैं, बच्चों को आपस में बात करने देना चाहिए।"

"अरे सारे बच्चे लोग तो है ना साथ में, तो चिंता की बात नहीं, चलिए चलते हैं।"
पापा ने लड़की की माँ को लगा सकुचाते देख कहा था। अब उनकी तरफ से प्रश्न पूछे जाने की आशा तो थी नहीं पर मुझे तो मेरा जवाब चाहिए था।
"क्या आप मुझे पुरी जिंदगी झेल सकेंगी?"
दिल तो किया इसी मजाकिया अंदाज में पूछ कर मौहौल को हल्का किया जाए,फिर सिचुएशन को देखा, बगल में बैठे लड़की के भाई को देखा और फिर लड़की की तरफ देखते ही इस आइडिया को दिमाग से झटकते हुए , लड़की की नजरों से नजरें मिलाते हुए सीधे तौर पर पूछ लिया.
"आपको किस तरह के लोग पसंद है, मेरा मतलब है, आपके होने वाले जीवनसाथी में क्या खूबी आपको सबसे अच्छी लगेगी?"
"मैंने कभी सोचा नहीं"
थोड़े देर की चुप्पी साधने के बाद, धीरे से उसने उत्तर दिया। पता था, कि कुछ ऐसा ही जवाब मिलेगा
साथ ही ये भी पता था कि शादी की बात शुरू होते ही, या शायद काफी पहले ही, ९० फिसदी
लड़कियाँ अपने होने वाले जीवनसाथी की कल्पना करने लग जाती हैं। शायद इंटरनेट पर या
किसी मेैगजीन में पढ़ा था, कौन सी पढ़ी हुई बात कब काम आ जाए, कोई नहीं बता सकता।
काफी मान मुनव्वल और समझाने के बाद मैं जान पाया था, कि उसके दिमाग का ट्यूब लाइट भी मेरे लिए ग्रीन सिग्नल दे रहा था। मेरी किस्मत की किश्ती को जैसे किनारा मिल गया था।
थोड़े ही देर मे सब आ गए, और लगभग पाँच मिनट बाद हम रूम से बाहर थे। बाहर निकलते ही मम्मी ने पूछा था

"कैसी लगी लड़की?"

मैंने स्माइल देते हुए हां मे सर हिला दिया। मां ने देरी ना करते हुए उन सब को घर चलने का निमंत्रण दे दिया। घर पर आते ही इधर उधर की बातें हुई। वैसे ना तो घर इतना बड़ा था, ना ही दिखाने लायक कुछ
स्पेशल था, फिर भी मम्मी ने सबको घर दिखा कर फारमलिटी पूरी कर ली थी।इन सब बातों में
ना जाने कब समय पंख लगा कर पार हुआ, पता ही नहीं चला। ऑफिस में समय तो इतना जल्दी समय पार नहीं होता कभी। अचानक घड़ी पर नजर पड़ने पर सोचने लगा था। शाम के ८ बज गए चुके थे और दिल कह रहा था कि काश अभी शाम के ५ ही बजे होते।पर काश तो काश ही होता है, खैर दिल की बातें दिल मे रखकर, मंथन काल लगाया तो पता चला फोन पर बुकिंग रिक्वेस्ट नहीं लेते। रविवार को वैसे भी छुट्टी का दिन होने से बहुत लाइन लगी होती है खाने के लिए वहाँ, और हो भी क्यूँ नहीं, हमारे यहाँ पर सबसे प्रसिद्ध रेसे्टोरेंट जो था।
मैं और भैया मंथन में टेबल बुक करने के लिए निकल गए। संयोग था, कि छोटे भाई का प्लान पता नहीं पर
वहाँ पर भी हम दोंनो टेबल के औपोजिट कार्नर पर बैठे थे। मुझे तो वैसे भी भुख नहीं थी, सो मैं नजरें
चुराकर उसे देखा जा रहा था। मैं चाह रहा था कि वक्त थम जाए, सेकंड मिनट में और मिनट घंटे मे बदल जाए पर मेरे साथ हो उल्टा रहा था, ऐसा लग रहा था कि घंटे मिनट में और मिनट सेकंड में बदल गए हैं।
समय जेट स्पीड से बीता जा रहा था पर मैं भी जैसे वक्त के साथ कौम्पीटिशन कर एक एक पल
से अपने यादों की डायरी भर लेना चाहता था। पर वक्त से भला कौन जीत पाया है, आखिरकार वो घड़ी आ गई, जब हमारे रास्ते अलग हो जाने थे। वो अपने परिवार के साथ होटेल जाने के लिए आटोरिक्शा में सवार हो गयी थी और हम सब घर जाने के लिए तैयार थे। औटो रिक्शा वाला भी जल्दी में ही था, सब को गुड नाइट विश करते ही आटो चल पड़ा। 
 
"ना जाने कब हर रोज की तरह शुरू होता दिन स्पेशल बन गया था"
सोचते हुए मेरे पैर भी मंद गति से घर की ओर बढ़ चले थे...