आज अगर उनकी बेटी साथ होती तो उन्हें यूँ वृद्धाश्रम में नहीं छोड़ देती। वृद्धा श्रम में बैठी, अनुराधा जी को आज बरसों पुरानी नेहा की कही बातें याद आ गई थी...
"मम्मी, आप देखना, जिसे आज वो दुत्कार रहे हैं, उसी बेटी पर एक दिन पापा को गर्व होगा।"
"मैं तो कुछ कर ना सकी, पर भगवान तुझे जरूर सफल बनाए।"
स्वयं अनुराधा जी ने भी तो बेटी को प्रोत्साहन देते हुए कहा था।स्मृतिपटल पर एक एक करके अतीत के चित्र उभरते गए।
"नारी सशक्तिकरण की आवश्यकता और उसके सामाजिक प्रभाव।"
क्लास के बोर्ड पर टापिक लिखने के बाद सामाजिक शास्त्र के प्रोफेसर कमलकांत ने नाक पर आ गए चश्मे को उसकी जगह पहुँचाते हुए कहा।
"कल सबको अपना स्पीच तैयार करके आना है। क्लास के बाद दो घंटे का सामाजिक विषयों पर चर्चा सत्र होगा। स्वयं डाक्टर वी के अय्यर इसको जज करेंगे"
इसी साल अपने सामाजिक कार्य के कारण नेशनल अवार्ड से सम्मानित अय्यर सर के सामाजिक कार्य और सहज व्यवहार से सभी परिचित थे।
"योर एटिट्युड विल मेक यू बिग (आपका विचार आपको एक दिन बड़ा बनाएगा)।"
अगले दिन की चर्चा सत्र में आवेश में आ गयी नेहा ने इतने जोरदार तरीके से अपनी बात रखी कि अय्यर सर ने उसकी खुले दिल से उसकी प्रशंसा की थी।
"मेरे जीवन में शांति और सुख मेरा बेटा ही लाएगा। बेटियाँ सिर्फ़ एक बोझ होती हैं, परायी सी। दहेज देकर शादी कर देने के बाद ही. उतारा जा सकता है। "
नेहा के पापा ने मम्मी को निशा की उपलब्धि बताने पर झुंझलाते हुए कहा था। नेहा की मम्मी और नेहा को तो जैसे ये सब सुनने की आदत सी हो गई थी। नेहा हर बार एसी बातों को अनसुनी कर पापा के लिए हर वो कुछ कर दिखाने के लिए तैयार रहती थी, जिससे उनका हृदय परिवर्तन हो सके, पर आज पर्दे की ओट में छुपी नेहा पापा की यह उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर सकी।
"माँ मैंने हर बार पापा की नजरों में एक आदर्श बेटी बनने कोशिश की, जबकि इसके विपरीत भैया ने तो कई बार पापा को ही कई बातें सुनाने में कसर नहीं छोड़ी है, फिर भी पापा उसे ही क्यों चाहते हैं? मेरा क्या अपराध है माँ?"
सुबकते हुए प्रश्न पुछते नेहा की निरीह आँखें माँ के चेहरे पर टिक गई।
"नारी जाति में जन्म होना ही सबसे बड़ा अपराध है, बेटी। समाज में तुम्हारे पापा जैसे कई कुंठित लोग मिल जाएंगे, जिन्हें बेटियाँ और बहनें बोझ लगती हैं।"
सुबकते बेटी को गले लगाकर कहते हुए माँ की आँखों से अंगारे बरस रहे थे। बरसों से मन के किसी कोने में दबा दर्द आज यूँ अचानक छलक आया था, शायद आज नेहा बेटी कम और दोस्त ज्यादा लग रही थी।
"तेरे पापा ने हमेशा बेटा की ही कामना की थी।पहली संतान बेटी पैदा होने पर उनके सपनों के महल जैसे ढ़ह गए, महीनों तक तेरा चेहरा नहीं देखा। अगर मैं उस दिन मैं गर्भ परिक्षण के लिए सशक्त रूप से मना नहीं कर देती, तो शायद तू आज इस दुनिया में ही ना होती।"
बार बार की मनुहार और बहुत अनुनय विनय के बाद पति ने घर में जगह तो दे दी थी पर स्पष्ट रूप से कहा था।
"घर में तो जगह दे रहा हूँ, पर दिल में कभी जगह नहीं मिलेगी।"
दो बरस बाद जन्में बेटे ने बेटी पैदा होने का दुःख कम तो जरूर कर दिया था, पर हमेशा के लिए दुर ना कर सका। जहाँ बेटे को इंजीनियरिंग कालेज में एडमिशन दिलाते दिल बाग बाग हो रहा था, वहीं बेटी को पढाना भी बोझ लग रहा था।
"ज्यादा पढ़ कर क्या करेगी, कल को दूसरे ही घर जाएगी। हमारा बेटा तो हमारे पास रहेगा। फालतु पैसे नहीं हैं मेरे पास। तुम्हें जो करना है करो।"
पापा ने दो टूक सुना दिया था। बेटी के नाम पर खर्चा जैसे पेट काटने बराबर लगता था। माँ ने अपने गहने बेचकर नेहा को बी ए में एडमिशन दिला दिया था। उस दिन पापा के रूखे व्यवहार ने नेहा को बरबस अय्यर सर की वो बातें याद आ गई थी, जो उन्होंने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए सेवा करने की नसीहत के साथ कहे थे, काश नेहा के पापा भी उनकी तरह होते! कितना सुख मिलता, जब दोनों मिलकर लोगों की वेदना दूर करने का प्रयत्न करते। स्वयं नेहा का दिल भी तो बहुत बड़ा था, तभी तो इतने दिन पापा के रूखे सूखे व्यवहार को यूँ झेल गई थी।
"माँ पापा, आप यहाँ इतने दिनों बाद यहाँ, मुझसे मिलने आयी है?"
वो चिरपरिचित आवाज अनुराधा जी को अतीत से बाहर निकल आने के लिए काफी था। उनकी बेटी नेहा को सामने देख आश्चर्य और सुख के मिश्रित भाव चेहरे पर उभर आये थे।
"आखिरकार पापा को मेरी याद आ ही गई। मैं ना कहती थी, कि पापा को एक दिन जरूर मुझ पर गर्व होगा"
माँ से गले मिलते, नेहा की आवाज में गर्व का पुट था।
"तुम्हारे भैया और भाभी ने हमें हमेशा के लिए घर से निकालकर इस वृद्धाश्रम में डाल दिया है।"
अनुराधा जी ने सुबकते हुए बताया।
"पर बेटा तुम यहां कैसे? कहीं तुम भी अपने सास ससुर को यहाँ छोड़ने तो नहींआयी हो?"
"आपकी बेटी इतनी, घटिया नहीं हो सकती। आजीवन सेवा का संकल्प लेकर घर छोड़ा था मैंने, शादी का तो सवाल ही नहीं उठता, फिर सास ससुर कहाँ से आएँगे।आज भी वही कर रही हूँ। घर छोड़ने के बाद, अय्यर सर की मदद से यह वृद्ध आश्रम की शुरूआत की थी। आज मैं यहाँ पर संचालिका के रूप में काम कर रही हूँ, इन सारे बुजुर्गों से वही अपनापन और प्यार मिला है, जो आपसे मिलता रहा था।"
नेहा यह कहते हुए भावुक हो गई थी। अनुराधा जी ने हल्के से हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया था।
"पर, माँ ये तो बताओ, ये सब हुआ कैसे? पापा तो भैया को बहुत चाहते थे। "
"हाँ पर तेरे भाई की शादी के बाद ६ महीने सब सठीक था, पर धीरे धीरे बहू ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए। शिकायतें और झगड़े तो जैसे दिनचर्या का हिस्सा हो गया था। तेरा भाई तो अब अपने पापा की भी नहीं सुनता था, आखिरकार आज उनलोगों ने हमें यहाँ भेज दिया"
बताते हुए अनराधा जी की आँखों ने अनकहा दर्द भी बयां कर दिया था।
"चिंतित ना हो माँ, जब तक आपकी यह बेटी है, तब तक आपलोग अकेले नहीं है। पापा आप दोनों मेरे साथ चलिए।"
कहते हुए पापा का हाथ पकड़ कर उठा रही नेहा को पहली बार उसके पापा ने प्यार से अपने पास बिठाया था।
"मैं वो जौहरी हूँ, जिसने पत्थर को हीरा समझा और हीरे को पत्थर। मैं अंधा था, अनु जो बेटी के प्यार और दुलार को समझ नहीं सका। जिस बेटे को जिंदगी भर चाहा, उसने दुत्कार दिया, और नेहा जिसे मैंने कभी दिल से नहीं अपनाया था, आज वही बेटी हमारा सहारा बन रही है। सचमुच, सौभाग्य से ही ऐसी बेटी मिलती है ऐ अनु। आज इतने वर्षों बाद मैं समझ पाया हूँ, बेटी अगर नेहा जैसी हो, तो बोझ नहीं बल्कि घर का मान और सम्मान होती हैं। आज से मैं भी अपनी बेटी के साथ मिलकर सेवाकार्य करूँगा।"
नेहा के पापा की आँखों में पश्चाताप के आँसू, नेहा के प्रति सम्मान और गर्व के प्रतीक बन कर छलक रहे थे...
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