सोमवार, 16 मई 2016

सेवा

कहीं अनाथ हुआ बालक, कहीं भुख से बिलबिलाते हजारों लोग, कहीं एक दूसरे की आंखों में अपनों को परिवार को ढूँढते पहचानते परिजन, कहीं रो रो कर सूख गयी पथरायी आँखे, अपने महाविनाश का सबूत, अपने पीछे छोड़ सुनामी चली गई थी | आस पास का सारा जीवन अस्त व्यस्त था।
कई सरकारी अफसर, डाक्टर अपने सुख आराम छोड़, जीवन को पटरी पर लाने की कोशिश में लगे थे। हजारों समाजसेवी संगठन दान देने की अपील करते, लोगों की सेवा में जी जान से जुटे हुए, अपनी एकता और सद्भाव का परिचय दे रहे थे। पुरे देश से भोजन, पानी, कपड़े, दवा आदि रोजमर्रा की वस्तुएँ एकत्र की जा रही थीं ।
शाम का समय था, जब ऐसा ही एक संगठनदिल्ली के एक व्यस्त इलाके में आगे आकर दान करने की अपील कर रहा था।

"जाओ बाबा, अभी हमें आपको देने के लिए पैसे नहीं हैं, ये तो हम उन लोगों के लिए पैसे जमा कर रहे हैं, जो सुनामी के आए विनाश से पिड़ित हैं।"

अचानक एक अधेड़ उम्र का भिखारी को उनके पास आया देख एक कार्यकर्ता झुंझलाते हुए बोल पड़ा। दान करने के अपील के लिए लायी हुई माइक पास होने की वजह से,  कार्यकर्ता के झुंझलाहट भरे शब्दों ने अनेक लोगों का  ध्यान उस ओर आकर्षित किया था|

"यही सुनकर तो आया हूँ। अधेड़ जरूर हो गया हूँ, पर सब समझता हूँ।"

कहते हुए अपने फटे कुर्ते की जेब से आज भीख में लायी सारी कमाई उस दान पात्र में डालकर, लाठी खटखटाते चले गए। जाते जाते अपने पीछे, गार्डन में घूमते, रेस्तराँ में पिज्जा खाते , मुवी टिकट के लिए लाइन में लगाते अनेक लोगों को सेवा की परिभाषा बतला गए थे।

शुक्रवार, 13 मई 2016

चस्का फेसबुक का

दुनिया में कुछ हम जैसे प्राणी भी होते हैं, जिन्हें कभी भी मेहनत नहीं करनी पड़ती है सोने के लिए। निंद्रा देवी की असीम अनुकम्पा रहती है। उनके लिए सोना, सोने-चाँदी से भी बहुमूल्य होता है, जब मौका मिला नहीं कि सो गए, जैसे जीवन में पुण्य कमाने का यही एकमेव तरीका बताया है इश्वर ने।

यूँ तो हमारी नायिका को भी निंद्रा देवी की ऐसे ही कृपा प्राप्त थी, पर आज निंद्रा रानी, किसी नयी नवेली दुल्हन की तरह नखरे दिखा रही थी या फिर किसी कारण वश अपने इस अनन्य भक्त से रूष्ट हो गई थी।

अबकी बार सो जाने का निश्चय करते हुए दोनों आँखों को भींच कर बंद कर लिया था। पिछले दो घंटे से सोने के सारे उपाय आजमा कर देख लिए थे, आधे घंटे के कसमकस के बाद भी जब निंद्रा देवी ने दया नहीं दिखाई तो, बत्ती जलाकर फेसबुक आन करके बैठ गयी। दुनिया भर में कैसा भी गम हो, फेसबुक पर निर्झर झरने की तरह कलकल करता विचारों और ज्ञान का प्रवाह अविरल रूप से प्रवाहित होता रहता है। अकेलेपन की व्यक्तिगत समस्या से लेकर देश की गरीबी जैसी व्यापक समस्याओं से काल्पनिक रूप से निजात दिलाने वाले समाज सुघारक और चिंतकों की बारात जरूर उपलब्ध हो जाएगी।

कुछ लोग तो मनीषा कोईराला टाइप भूली बिसरी हीरोइनों का चित्र प्रोफाइल पिक्चर पर लगा कर असीम शांति और सुख का अनुभव करते हैं, मानों उनका उद्धार कर दिया हो। सागर की लहरों की तरह उभरते नये जमाने के विचारों, और पी. जे. की आयी बाढ़ को पढ़ते और शेयर करते वक्त का पता ही नहीं चलता है।

अपनी नायिका का ही उदाहरण ले लेते हैं। चाहे गरमी की छुट्टियां हो या एग्जाम फिवर मोहतरमा तो फेसबुक फीवर से ही ग्रसित है। नींद से छुट्टियां पाते ही नये मोबाइल एस ३ के साथ बन जाती है फेसबुकिया समाजसुधारक । नये पीढ़ी के स्मार्ट फोन की नई फसल ने तो मानों सारे गुड़ गोबर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, वरना हमारे जमाने में तो एस३ ट्रेन के कोच पर लिखे होते थे।

आजकल तो प्यार का भूत भी फेसबुक पर ही चढ़ता है। हजारों लाखों की संख्या में युवा एक दूसरे से मन भर चैटियाते रहते हैं। प्यार की कबड्डी फेसबुक के मैदान पर खेलकर जीतने की कोशिश में कई शहीद होकर बर्बाद भी हो जाते हैं। कुछ लोग तो हमारी नायिका की तरह होते हैं, बड़े ही आवारा और फोकटिया किस्म के लड़के, जिन्हें कभी कोई लड़की घास नहीं डालती है। ऐसे लोगों को फेसबुक पर किसी सुंदर माडल का फोटो प्रोफाईल पिक्चर सेट कर, कोई सुंदर सा लड़की का नाम रखकर, स्त्री चरित्र की चादर ओढ़े, आए दिन रोमियो बने आशिकों के साथ चुहलबाजी करते इनको बड़ा मज़ा आता है। प्यार की एक बूँद को तरसते इन आनलाइन रोमियो को यूँ चकमा देकर मानों प्रेम की ए. बी. सी. मे हुए हार का बदला ले कर जीत मे बदल रहे हों।

कुल मिलाकर अगर हमारी आज की काल्पनिक फेसबुकिया नायिका की तरह लोग अपना समय फोेसबुक और व्हाट्स अप पर लुटाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब आई. आई. टी. एम. जैसी प्रसिद्ध प्रबंधन संस्थान, मानव संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में "फेसबुक और व्हाटस अप" जैसे मैसेंजर से नफरत करने का नया अध्याय जोडकर और इंटरनेट के इस भँवर में जीवन बर्बाद कर रहे युवा पीढ़ी को एक अवतार की तरह बचा रहे होंगे।

मंगलवार, 10 मई 2016

सात साल बाद


"हाय ! काफी सालों बाद तुमसे बात हो रही है। कैसे हो?"
फेसबुक खोलते ही निशा का मैसेज पौप अप हुआ था। अभी कुछ ही दिनों पहले निशा की फ्रैंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट की थी।
राज : "यूँ इतने दिनों बाद, अचानक मेरी याद कैसे आ गई?"
निशा : "इडियट, याद तो हमेशा तुम्हारी आती थी, पर तुम ही मुँह छुपा जाने कहाँ चले गए थे।"
निशा : "तुम्हारे शहर में मेरा ट्रांस्फ़र हुआ है।"
निशा सरकार, एसेसिएट मैनेजर, आई केयर. राज ने उसके प्रोफाइल पढ़ते समय देखा था।
राज : "तुम पढ़ाकू तो थी ही, पर जाब करोगी ये बात हजम नहीं हो रही है। तुम्हारे घर वालों ने इजाजत दे दी?"
निशा : "कल मिलो, तो बताती हूँ।कहाँ मिलेंगे?"
राज : "रघुलीला माल, कैफे कोफी डे, ५ बजे?"
निशा: "ओके बाय, गुडनाइट। :)"
राज की निशा से चैटिंग तो बंद हो गई थी, पर पूरे सात सालों के बाद निशा के सथ हुए चैट ने पुरानी यादों को ताजा कर दिया था, जिसे उसने कभी अतीत के समुंदर में हमेशा के लिए विसर्जित कर दिया था।

निशा से पहली मुलाकात कालेज की कैंटीन में हुई थी और पहली ही मुलाकात में उसे प्यार का इज़हार करने वाले वो तीन जादुई शब्द कहने वाला था। नहीं नहीं, राज कतई फ्लर्ट नहीं कर रहा था, वो तो उसे सिनियर्स की रैगिंग की वजह से करना पड़ रहा था। उन दिनों रैगिंग करके जूनियर्स को परेशान करना एक फैशन था।

यूँ तो निशा को मन ही मन चाहने वालों की कमी नहीं थी पर उसे प्रपोज करने की हिम्मत जुटाने का मतलब कुल्हाड़ी पर पैर मारने के बराबर था। निशा के सनकी और बद्दिमाग भाई से पुरा कालेज परिचित था। सबके सामने उसने सिर्फ इसलिए एक लड़के को पीट पीटकर उसकी हड्डी पसली एक कर द, क्योंकि उसके दोस्त की बहन को प्रपोज करते उसे देख लिया था उसने।कुल मिलाकर राज को पिटवाने की पूरी तैयारी कर ली थी उसके सिनियर्स ने।

"एक्सक्यूज मी"
इस बात से अनभिज्ञ राज, निशा के पास पहुँच उसे दोस्तों के साथ हँसते हुए देख कहा था।
"यस, कहिए"
"आइए सर, रामू , सर के लिए उनका स्पेशल चाय दे।"
इससे पहले कि राज मुँह खोलता, हिन्दी के प्रोफेसर रमाकांत को आते देख कैंटीन स्वामी ने जोर से आवाज दी थी। प्रोफेसर को आते देख, सिनियर्स ने चुपचाप पतली गली पकड़कर निकलने में ही भलाई समझी।
"जी.. जी.. मैं.. मेर मतलब..."
"हाँ, आप यहाँ बैठे सकते हैं। क्या आपको सिनियर्स ने यहाँ भेजा है?"
निशा ने सिचुएशन को सम्हालते हुए धीरे से पूछा था। निशा की हिरणी जैसी बड़ी और पारखी अाँखों ने राज के चेहरे पर आए सिकन, और रैगिंग के लिए कुख्यात सिनियर्स के ग्रुप का प्रोफेसर के आते ही चुपचाप खिसक लेने का वो दृश्य दोनों कैद कर लिया था।
"थैंक्स, पर आपको कैसे पता चला?" आश्चर्य और धन्यवाद के मिश्रित भाव से राज के गोल हुए होंठ खुले ही रह गए।
"आप अभी कॉलेज में नए हैं, थोड़े ही दिनों में ये सब समझ जाएंगे।" 
बोलते हुए निशा के चेहरे से गर्व छलक आया था।
"और हाँ जितना हो सके मुझसे दूर रहिए। हर बार मैं शायद आपकी मदद ना कर पांऊ"
सलाह देते हुए, राज को असमंजस में छोड़, निशा अपने दोस्तों के साथ चली गई थी। बेचारा राज अपने मददगार का नाम भी नहीं पूछ पाया था।
"पहले दिन की शुरुआत बहुत ही अप्रत्याशित हुई थी, पर जो भी हो, उसका प्रेजेंस औफ माइंड कमाल का है, पर उसने दूर रहने की बात क्यों कही?"
देर रात ये सब सोचते हुए, नींद ने कब उसे अपने आगोश में लिया पता ही नहीं चला। सुबह कालेज में जब दोस्तों से पता चला तो फिर एक क्लास में होते हुए भी कभी बातें करने की कोशिश नहीं की।
 
"आप तो बड़े छुपे रूस्तम निकले, क्लास में प्रथम आने पर दिल से बधाई । जनाब को कालेज में तो कभी पढाई के लिए सिरियस नहीं देखा।"

निशा ने हाथ मिलाकर बधाई दी थी। क्लास में मजाक मस्ती और हाजिरजबाबी के लिए तो उसे सभी जानते थे, पर हर एक्टिविटी में अव्वल रहने वाला राज पढ़ाई में भी बाजी मार लेगा इसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी।

"धन्यवाद! क्यूँ मौज मस्ती करते हुए पढ़ाई नहीं की जा सकती?"

पूछते हुए राज की आखें उससे दगा करते हुए निशा के चेहरे पर टिक सी गयी थी।

"आपको पता है, आज तक क्लास मे निशा ही फर्स्ट आती रही है।"

निशा के पास खड़ी सहेली ने ना जाने क्यों, ये बताना जरूरी समझा।

"फिर तो मुझे सारी बोलना पड़ेगा"

राज के कान पकड़कर बोलने के नाटकीय अंदाज पर दोनों सहेलियाँ हँस पड़ी थी।

"नहीं ऐसी बात नहीं है, पर मुझे बस कैमिस्ट्री उतनी समझ नहीं आती, वरना आपको सारी बोलने का मोका नहीं मिलता।"

"आपको समझने की क्या जरूरत है? मैंने तो सुना है, जो समझ नहीं आता है, उसे लड़कियाँ याद कर लिया करती हैं।"
राज ने व्यंग्य का पुट देते हुए कहा था।

"सब लड़कियाँ एक जैसी नहीं होती हैं।"

"अगर ऐसी बात है, और आपको व आपके भाई को आपत्ति ना हो, तो हम आपको कैमिस्ट्री सिखा दिया करेंगे"

राज ने चैलेंज स्वीकार करते हुए अपने बड़े दिल का परिचय दिया था।

"सच, आप हमें सिखाएंगे? भाई को मैं समझा दूँगी"

निशा ने अविश्वास दिखाते इतने जल्दी में कह डाला था, जैसे की एक पल की देरी होती तो राज सिखाने वाली बात से मुकर जाता।

"जरूर पर मुझे आप नहीं तुम कहना पड़ेगा। हम अच्छे दोस्त रहेंगे।"

फिर तो अक्सर कालेज खत्म होते ही कालेज की लाइब्रेरी में दिन बीत जाता था।
समय पंख लगा कर उड़ा जा रहा था, जल्द ही कॉलेज की परीक्षा एक बार फिर से शुरू हो गई थी।
इस बार सच में निशा ने राजेश से चार नंबर अधिक पाकर उसे सारी कहने का मौका नहीं दिया था।
"तुमने तो अपना कहा सिद्ध कर दिया है, प्रथम आने पर बधाई"

"धन्यवाद, पर इस बधाई पर तुम्हारा भी हक है, तुम्हारे सिखाए बिना ये मैं कैसे कर पाती?"
कहते हुए निशा के चेहरे पर हल्की लालिमा आ गई थी। केमिस्ट्री सिखते सिखाते, कॉलेज की लाइब्रेरी, कैंटिन, क्लासरूम उनकी पनपती हुई लव केमिस्ट्री के साक्षी बनने लगे थे। ऐसा नहीं है कि प्यार की ये तपिस निशा तक नहीं पहुँची थी, पर वो परिवार के खिलाफ कतई नहीं जा सकती थीं, शायद इतने दिनों साथ रहकर राज यह समझ चुका था, इसलिए राज ने कभी प्रत्यक्ष रूप से कभी पहल भी नहीं की थी।

"राज, मेरी शादी पक्की हो चुकी है, पहला कार्ड तुम्हें दे रही हूँ, तुम आओगे ना?"

कार्ड थमाते हुए उसकी हिरणी सी आँखे राज के चेहरे पर निबद्ध थी।

जवाब में राज ने आँखें झुका ली थी। उसके बाद निशा चाहकर भी वहाँ रूक नहीं पायी थी।
निशा की शादी की खबर सुनते ही वो जैसे कहीं खो गया था। वो मस्ती, वो साथी, वो शहर सब पीछे छुट गए थे। रह गया था, तो आज का गम्भीर और संजीदा राज

यूँ तो राज की हर सुबह की शुरुआत योग और मंगल मंत्रों के साथ होती थी, पर रात देर सोने की वजह से आज की सुबह उसके नींद ने हजम कर लिया था। इतने दिनों बाद निशा कैसी दिखती होगी? उसका सामना वो कैसे करेगा, क्या बातें होंगी, हो भी पाएँगी या नहीं, सोचते हुए कब शाम के चार बज गये पता नहीं चला।

आदतन अपने समय से पहँचकर कैफे काफी डे के उस कार्नर की टेबल पर बैठा राज बाहर के आते जाते लोंगों में अपने सवालों के जवाब ढूँढने की कोशिश कर रहा था, कि निशा आती दिखी।

वही कमर तक लम्बे बाल, हिरणी जैसी अाँखों के बीच काली छोटी सी बिंदी, उँची गोल नाक के नीचे पतले होंठ पर उसकी फेवरेट हल्की गुलाबी लिपस्टिक और हमेशा की तरह मुस्कराता चेहरा, कुछ भी तो नहीं बदला था इन सात सालों में।  
कान से लटकते छोटे छोटे झुमके, मानों पूरी जिंदगी साथ लटके रहने का सीख दे रहे थे।

"राज तुम तो बहुत बदले बदले से लग रहे हो, धीर गंभीर इतना सिरियस मैनें तुम्हें कभी नहीं देखा है।"
निशा ने बैठते हुए कहा था। राज की आंखों पर लगे चश्मे ने चेहरे पर छाये गंभीरता को दोगुना कर दिया था।

"छोड़ो इन बातों को, बताओ कैसी हो?और जाब पर कब से हो?"

"अरे, अभी तो आई हूँ, थोड़ा वक्त दो"

राज को जैसे अपनी गलती का अहसास हुआ, दो कैपेचिनो और ग्रिल सैंडविच का आर्डर देकर जब वह वापस आया तो चेहरे पर शांति थी , पर शायद यह सवाल उसे अंदर तक परेशान कर रहा था,

काफी सिप करते हुए, निशा ने बताया, कि कैसे शादी के बाद ससुराल वालों ने उसे घर मे ही कैदी बना लिया था। पहली ही रात उसकी स्थिति स्पष्ट हो गई थी।

"रस्साली, एकदम ठंडी औरत है, पति को कैसे खुश करते हैं, पता नहीं।"

नशे में धुत्त पति पुरे जोर से दुत्कारते हुए बाजारू औरत चंदा के पास चला गया था। मनमोहक प्रथम रात्रि की ऐसी विभत्स कल्पना तो नहीं की थी ना।

"जाने कैसी कुल्लछिनी है? अपने पति को एक दिन भी अपने साथ बाँध कर नहीं रख पायी"
"और नहीं तो क्या, लगता है, मायके का भूत उतरा नहीं है सर से"

सास और जेठानी दोनों जैसे ताना देने में काम्पीटिशन कर रहे हों।
रोज के ताने और नशे में धुत्त पति की गालियां सुनती निशा शायद अपने परिवार से किए वादा अदायगी की सजा चुपचाप भुगत रही थी।

"नशे में धुत्त पति के एक्सिडेंट में हुए मौत ने ससुराल में मेरा दाना पानी बंद करवा दिया था। सासु और जेठानी ने उसी समय मुझे घर से निकाल बाहर का रास्ता दिखाया था। पास की महिला समाजसेवी अंजलि श्रीवास्तव ने मेरी मदद की थी।"

"भाई और पापा को खबर क्यों नहीं किया निशा?" राज ने हाथ थामते हुए पूछा था।
 
"भाई और पापा ने तो मेरी शादी करवा कर मुक्ति पा ली थी, शुरू से यही कहा और सिखाया, चाहे कुछ भी हो शादी के बाद मायका पराया ही होता है, ससुराल में ही अपनापन ढूँढने की कोशिश करो। उनके साथ नहीं जाना चाहती थी।"

"अंजलि श्रीवास्तव की मदद से मैने अपना पहला जाब शुरू कर दिया था। आज पुरे चार साल बाद आज जो हूँ, तुम्हारे सामने हूँ।"

"तुम्हें मेरी याद इतने दिनों बाद आयी? पहले क्यों नहीं बताया ऐ निशा?"

"जिस हाल में मैंनें तुम्हें छोड़ दिया था, उसके बाद मैं तुम्हारा सामना कैसे कर पाती राज?सच पूछो तो, इतने दिनों में एक तुम्हारी ही तो याद आयी थी। हिकारत भरी नजरों और तानों ने मुझे अपनी नजरों में गिरा दिया था। तुम्हारी प्रेरणा और मिसेज श्रीवास्तव की मदद से ही तो आज यहाँ तक पहुँच पायी हूँ।"

"एक बार तुम्हें जाने देने की गलती कर दी थी। पर आज ये गलती दुबारा नहीं दुहराऊंगा।"

 दो मिनट के मौन के बाद, राज ने घुटनों के बल बैठकर चिरपरिचित अंदाज में, वर्षों से अपने दिल के किसी कोने में दबाए प्यार का इजहार किया था।

"आई लव यू। विल यू मैरी मी मिस निशा सरकार?"

 कहीं अटका हुआ रैगिंग के चक्कर में मजबूरीवश कहे जाने वाले प्यार के वो जादुई तीन शब्दों की मिठास, आज सात सालों के बाद निशा के कानों में शहद की तरह घुले जा रहे थे..।