उस दिन
काफी खुश थी वो, और
खुश हो भी क्यों नहीं, एक
तो उसे मनपसंद यूनिवर्सिटी
में पी. एच. डी.
की स्कालरशिप मिल गई
थी और उपर से राजेश पूरे दो
साल की ट्रेनिंग के बाद छुट्टी
पर आया था । जल्दी से घर के
सारे काम निपटाकर आलमारी से
अपना फेवरेट वाला पिंक सूट
निकला था। जल्दी जल्दी तैयार
होकर अपने आप को एक बार मिरर
में देखा। घुंघराले काले बालों
पर गोल्डन कलर का हेअर पिन,
काली बड़ी आँखों के
बीच में छोटी सी बिंदी,
गुलाबी रंग की लिपस्टिक
से सजे होंठ , बला
की खूबसूरती पर इतराती हुई,
घर से निकल ही रही थी
कि उसे याद आया कि राजेश के
लिए तो उसने कुछ गिफ्ट भी नहीं
ली है। इतने दिनों बाद मिलने
वाला है, एक गिफ्ट
तो बनता है।
"भैया,
क्रास वर्ड ले चलो
जल्दी"
रिक्शा
पर बैठते ही उसने कहा था,
सालों के इंतजार के
बाद जैसे ये एक घंटा बहुत भारी
पड़ रहा था, वो समय
से भी तेज उड़कर अपने राजेश
के पास पहुँच जाना चाहती थी।
पांच मिनट बाद रोमांटिक सेक्शन
में एक के बाद एक किताब देखते
हुए उसकी नजरें पुष्पा सक्सेना
की लिखी हुई किताब "सूर्यास्त के बाद" पर
टिक गई।
"पता है,
मुझे रोमांटिक कहानियाँ
पढ़ना बहुत पसंद है, और
कहानी अगर डॉक्टर पुष्पा सक्सेना जी
की लिखी हों तो पढ़ने का मज़ा
दोगुना हो जाता है।"
उसे राजेश
की कही ये बात अचानक याद हो आई
थी। वैसे तो उसे रोमांटिक
कहानियाँ पढ़ने का कोई खास
शौक नहीं था, पर हाँ,
राजेश जब वही कहानियाँ
उसे सुनाता था, तो
वो कहानियाँ में इस कदर खो
जाती थी जैसे खुद हर कहानी की
नायिका हो और राजेश उसका नायक।
बुक गिफ्ट
पैक करवाते उसके चेहरे पर
संतुष्टि के भाव उभर आये थे,
उसे पता था, इससे
अच्छा गिफ्ट राजेश के लिए हो
नहीं सकता, आखिर
इतने दिनों की ट्रेनिंग में
वयस्त उसे ये सब पढ़ने का मौका
कहाँ मिला होगा।
कुछ ही
देर बाद वो वृंदावन पार्क
में उसी पेड़ के नीचे बैठी थी,
जहां न जाने कितने ही
शाम दोंनों ने एक साथ गुजारे
थे। शाम का समय थे। राजेश अभी
आया नहीं था । कालेज से
छुटने के बाद न जाने कितने
प्रेमी जोड़े की शाम इसी पार्क
में बीत जाया करती थी । राजेश
से उसकी पहली मुलाकात भी तो
यही हुई थी।
"एक्सक्यूज
मी, मे आई हेल्प यू?"
ऊँची डाल
पर लगे कनेल का फूल तोड़ने की
कोशिश करते देख एक लड़के ने
उससे कहा था।
"नो
थैंक्स, आई कैन मैनेज
इट"
कहकर वो
फिर से फूल तोड़ने में वयस्त
हो गई थी। तीन चार बार की कोशिश
के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा,
वो लड़का वही कुर्सी
पर बैठा उसे देख रहा था। इस
बार मुस्कराते हुए बिना पूछे,
फूल तोड़कर उसके हाथों
पर रख दिया और कहा
"इस उम्र
में तो लड़कियाँ गुलाब के
फूलों की दिवानी होती हैं"
"मुझे
कनेल के फूल बहोत पसंद है,
मेरी मां के जाने के
बाद हर सुबह मेरे बाबा मेरे
लिए यह फूल ले आते थे"
फूल लेकर
ये बोलते हुए उसकी आँखें पनीली
हो गई।
"आय एम
सारी, मुझे पता नहीं
था, आपके मां बाबा
नहीं है।"
"इट्स
ओ. के.।
वैसे तो ये बात तो मैं किसी से
बताती नहीं, पर पता
नहीं क्यों आपके पूछने पर अपने
आप को रोक नहीं पाई।
"बाइ द वे,
थैंक्स फॉर योर हेल्प।"
"यू आर
वेलकम, अब मुझे जाना
होगा"
मुस्कराते
हुए कहकर वो पार्क की छोटी सी
दिवार फलांगता गायब हो गया।
कुछ दिनों बाद कालेज की लाइब्रेरी
में किताब ढूँढती उसकी नजर
बुक इशु कराते उस लड़के पर
पड़ी।
"हाय,
उस दिन आप अचानक चले
गये थोे, मैं आपका
नाम भी नहीं पूछ सकी थी। आप
भी इसी कालेज में पढ़ते हैं?"
"मैं
राजेश हूँ, और मैं
यहाँ पर इतिहास विभाग में
इंटर्नशिप कर रहा हूँ। दो
महीने पहले ही ज्वाइन किया
है
उसे देख
कर मुस्कराते हुए जवाब दिया
था उसने।
फिर तो
अक्सर मुलाकात होने लगी,
उसके नीरस और अकेलेपन
की दुनिया में, राजेश
उसके सुख दुःख का साथी बन गया
था । कब ये दोस्ती, और
दोस्ती प्यार में बदल गई पता
ही नहीं चला। खयालों
में खोई हुई उसकी तंद्रा अचानक
आए फोन के आवाज से भंग हुई।
राजेश का नंबर मोबाइल स्क्रीन
पर फ्लैश होता देख खुशी से
चहकते हुए फोन उठाया
"आप जल्दी
से सिटी हॉस्पिटल आ जाइए,
मिस्टर राजेश का
एक्सिडेंट हो गया है। नशे में
धुत ड्राइवर ट्रक की स्पीड
कंट्रोल नहीं कर पाया था,
सिग्नल तोड़ते हुए
बाइक के साथ टकरा गया था।"
उस पर तो
जैसे वज्रपाात हुआ था, चेहरे
की खुशी काफूर हो गई थी। मां
बाबा के जाने के बाद उसकी
दुनिया राजेश की इर्द गिर्द
ही बस गई थी, पर लग
रहा था विधाता ने जैसे उसकी
झोली में सुख से कहीं ज्यादा
दुःख ही दिए थे। कुछ वर्षों
पहले पापा की ऐसी ही एक एक्सीडेंट
दुर्घटना मे हुए निधन की याद
ने अचानक उसे चैतन्य किया था।
"नहीं
इस बार नहीं" बुदबुदाते
हुए बिजली की गति से पार्क के
गेट से बाहर निकल गई थी।
"ऐसे
दुःख की घड़ी में लोंगों को
रोते हारते देखा है, "आप
काफी बोल्ड और प्रैक्टिकल
लड़की हैं"
हास्पिटल
के रिसेप्सन पर, राजेश
की हालत पूछते उसके संयमित
और विश्वास भरे भाव देखकर पास
बैठे नर्स ने उसकी सराहना की
थी।
शायद उसे
अभी भी इश्वर पर भरोसा था,
या माँ पिताजी के
आकस्मिक निधन ने उसे ऐसी
परिस्थितियों से निपटने की
शक्ति दे दी थी। आपरेशन थिएटर
के बाहर ईजी चेयर पर बैठी छत
ताकती हुई एकदम शिथिल सी लग
रही थी, मानों ईश्वर
से राजेश की सलामती के लिए
तपस्या कर रही हो।
"आखिरकार
आपका विश्वास जीत गया। राजेश
अब खतरे से बाहर है।"
करीब साढ़े
तीन घंटे बाद रिसेप्सन वाली
नर्स ने उसके कंधे पर हाथ रखकर
सूचित किया था।
" इतने
बड़े एक्सीडेंट के बाद बच जाना
किसी चमत्कार से कम नहीं है।
आप उसे दस दिनों में घर ले जा
सकती हैं, पर पुरे
दो महीने तक हर सप्ताह चेक अप
के लिए आना पड़ेगा।"
पास खड़े
डॉक्टर ने बताया। उसने
अश्रुपुरित नयनों से डॉक्टर
की ओर देखा। ईश्वर और डॉक्टर
के प्रति धन्यवाद के रूप में
उसकी आँखों से दो मोती गालों
पर लुढ़क आए थे।
शायद विधाता
से भी उसका और दुःख देखा नहीं
गया। एकबार फिर उसकी अँधकार
होती जिंदगी, आशा
और विश्वास की किरणों से जगमगा
रही थी।