बुधवार, 27 अप्रैल 2016

अकस्मात्

उस दिन काफी खुश थी वो, और खुश हो भी क्यों नहीं, एक तो उसे मनपसंद यूनिवर्सिटी में पी. एच. डी. की स्कालरशिप मिल गई थी और उपर से राजेश पूरे दो साल की ट्रेनिंग के बाद छुट्टी पर आया था । जल्दी से घर के सारे काम निपटाकर आलमारी से अपना फेवरेट वाला पिंक सूट निकला था। जल्दी जल्दी तैयार होकर अपने आप को एक बार मिरर में देखा। घुंघराले काले बालों पर गोल्डन कलर का हेअर पिन, काली बड़ी आँखों के बीच में छोटी सी बिंदी, गुलाबी रंग की लिपस्टिक से सजे होंठ , बला की खूबसूरती पर इतराती हुई, घर से निकल ही रही थी कि उसे याद आया कि राजेश के लिए तो उसने कुछ गिफ्ट भी नहीं ली है। इतने दिनों बाद मिलने वाला है, एक गिफ्ट तो बनता है।

"भैया, क्रास वर्ड ले चलो जल्दी"

रिक्शा पर बैठते ही उसने कहा था, सालों के इंतजार के बाद जैसे ये एक घंटा बहुत भारी पड़ रहा था, वो समय से भी तेज उड़कर अपने राजेश के पास पहुँच जाना चाहती थी। पांच मिनट बाद रोमांटिक सेक्शन में एक के बाद एक किताब देखते हुए उसकी नजरें पुष्पा सक्सेना की लिखी हुई किताब "सूर्यास्त के बादपर टिक गई। 
 
"पता है, मुझे रोमांटिक कहानियाँ पढ़ना बहुत पसंद है, और कहानी अगर डॉक्टर पुष्पा सक्सेना जी की लिखी हों तो पढ़ने का मज़ा दोगुना हो जाता है।"

उसे राजेश की कही ये बात अचानक याद हो आई थी। वैसे तो उसे रोमांटिक कहानियाँ पढ़ने का कोई खास शौक नहीं था, पर हाँ, राजेश जब वही कहानियाँ उसे सुनाता था, तो वो कहानियाँ में इस कदर खो जाती थी जैसे खुद हर कहानी की नायिका हो और राजेश उसका नायक। 
 
बुक गिफ्ट पैक करवाते उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव उभर आये थे, उसे पता था, इससे अच्छा गिफ्ट राजेश के लिए हो नहीं सकता, आखिर इतने दिनों की ट्रेनिंग में वयस्त उसे ये सब पढ़ने का मौका कहाँ मिला होगा।

कुछ ही देर बाद वो वृंदावन पार्क में उसी पेड़ के नीचे बैठी थी, जहां न जाने कितने ही शाम दोंनों ने एक साथ गुजारे थे। शाम का समय थे। राजेश अभी आया नहीं था । कालेज से छुटने के बाद न जाने कितने प्रेमी जोड़े की शाम इसी पार्क में बीत जाया करती थी । राजेश से उसकी पहली मुलाकात भी तो यही हुई थी।

"एक्सक्यूज मी, मे आई हेल्प यू?"

ऊँची डाल पर लगे कनेल का फूल तोड़ने की कोशिश करते देख एक लड़के ने उससे कहा था। 
 
"नो थैंक्स, आई कैन मैनेज इट"

कहकर वो फिर से फूल तोड़ने में वयस्त हो गई थी। तीन चार बार की कोशिश के बाद उसने पीछे मुड़कर देखा, वो लड़का वही कुर्सी पर बैठा उसे देख रहा था। इस बार मुस्कराते हुए बिना पूछे, फूल तोड़कर उसके हाथों पर रख दिया और कहा

"इस उम्र में तो लड़कियाँ गुलाब के फूलों की दिवानी होती हैं"

"मुझे कनेल के फूल बहोत पसंद है, मेरी मां के जाने के बाद हर सुबह मेरे बाबा मेरे लिए यह फूल ले आते थे"
फूल लेकर ये बोलते हुए उसकी आँखें पनीली हो गई।

"आय एम सारी, मुझे पता नहीं था, आपके मां बाबा नहीं है।"

"इट्स ओ. के.। वैसे तो ये बात तो मैं किसी से बताती नहीं, पर पता नहीं क्यों आपके पूछने पर अपने आप को रोक नहीं पाई।

 "बाइ द वे, थैंक्स फॉर योर हेल्प।"
"यू आर वेलकम, अब मुझे जाना होगा"

मुस्कराते हुए कहकर वो पार्क की छोटी सी दिवार फलांगता गायब हो गया। कुछ दिनों बाद कालेज की लाइब्रेरी में किताब ढूँढती उसकी नजर बुक इशु कराते उस लड़के पर पड़ी।

"हाय, उस दिन आप अचानक चले गये थोे, मैं आपका नाम भी नहीं पूछ सकी थी। आप भी इसी कालेज में पढ़ते हैं?"

"मैं राजेश हूँ, और मैं यहाँ पर इतिहास विभाग में इंटर्नशिप कर रहा हूँ। दो महीने पहले ही ज्वाइन किया है
उसे देख कर मुस्कराते हुए जवाब दिया था उसने।

फिर तो अक्सर मुलाकात होने लगी, उसके नीरस और अकेलेपन की दुनिया में, राजेश उसके सुख दुःख का साथी बन गया था । कब ये दोस्ती, और दोस्ती प्यार में बदल गई पता ही नहीं चला। खयालों में खोई हुई उसकी तंद्रा अचानक आए फोन के आवाज से भंग हुई। राजेश का नंबर मोबाइल स्क्रीन पर फ्लैश होता देख खुशी से चहकते हुए फोन उठाया 
 
"आप जल्दी से सिटी हॉस्पिटल आ जाइए, मिस्टर राजेश का एक्सिडेंट हो गया है। नशे में धुत ड्राइवर ट्रक की स्पीड कंट्रोल नहीं कर पाया था, सिग्नल तोड़ते हुए बाइक के साथ टकरा गया था।"

उस पर तो जैसे वज्रपाात हुआ था, चेहरे की खुशी काफूर हो गई थी। मां बाबा के जाने के बाद उसकी दुनिया राजेश की इर्द गिर्द ही बस गई थी, पर लग रहा था विधाता ने जैसे उसकी झोली में सुख से कहीं ज्यादा दुःख ही दिए थे। कुछ वर्षों पहले पापा की ऐसी ही एक एक्सीडेंट दुर्घटना मे हुए निधन की याद ने अचानक उसे चैतन्य किया था। 
 
"नहीं इस बार नहीं" बुदबुदाते हुए बिजली की गति से पार्क के गेट से बाहर निकल गई थी।

"ऐसे दुःख की घड़ी में लोंगों को रोते हारते देखा है, "आप काफी बोल्ड और प्रैक्टिकल लड़की हैं"

हास्पिटल के रिसेप्सन पर, राजेश की हालत पूछते उसके संयमित और विश्वास भरे भाव देखकर पास बैठे नर्स ने उसकी सराहना की थी।

शायद उसे अभी भी इश्वर पर भरोसा था, या माँ पिताजी के आकस्मिक निधन ने उसे ऐसी परिस्थितियों से निपटने की शक्ति दे दी थी। आपरेशन थिएटर के बाहर ईजी चेयर पर बैठी छत ताकती हुई एकदम शिथिल सी लग रही थी, मानों ईश्वर से राजेश की सलामती के लिए तपस्या कर रही हो।

"आखिरकार आपका विश्वास जीत गया। राजेश अब खतरे से बाहर है।"

करीब साढ़े तीन घंटे बाद रिसेप्सन वाली नर्स ने उसके कंधे पर हाथ रखकर सूचित किया था।

" इतने बड़े एक्सीडेंट के बाद बच जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। आप उसे दस दिनों में घर ले जा सकती हैं, पर पुरे दो महीने तक हर सप्ताह चेक अप के लिए आना पड़ेगा।"

पास खड़े डॉक्टर ने बताया। उसने अश्रुपुरित नयनों से डॉक्टर की ओर देखा। ईश्वर और डॉक्टर के प्रति धन्यवाद के रूप में उसकी आँखों से दो मोती गालों पर लुढ़क आए थे।

शायद विधाता से भी उसका और दुःख देखा नहीं गया। एकबार फिर उसकी अँधकार होती जिंदगी, आशा और विश्वास की किरणों से जगमगा रही थी।








गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

यादों के पन्ने

हर दिन की तरह आज की सुबह की शुरुआत भी लेट से हुई थी।उठते ही पापा की आवाज कानों में सुनाई दी
"अरे! आज तो जलदी उठ जाओ".

पीछे से छोटे भाई ने भी सुर में सुर मिलाया,

"कितना आलसी है। अरे जल्दी से तैयार हो जाओ, लड़की देखने नहीं जाना है?"

आँखें मलता हुआ मैं बिस्तर छोड़कर उठा ही था कि अपने घर के सोनू निगम का गाना सुनाई दिया मुझे देखते ही गाना बदलकर कब लता मंगेशकर बन गया पता ही नहीं चला।
"आजकल पाँव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे"
पर आज तो उसका यूँ चिढ़ाना भी अच्छा लग रहा था।ऐसा नहीं है, कि हम पहली बार किसी लड़की को देखने जा रहे थे, पर इस बार की बात ही अलग थी। खैर दिल के उमंग को दिमाग रूपी जेल में कैद कर, मैने धरती पर पैर रखे ही थे कि भाई साहब ने अपनी सख्त हिदायत दे डाली।
"दाढ़ी वाढ़ी बना लेना, और अच्छे से तैयार हो कर चलना और हाँ जूते जरूर पॉलिश कर लेना "
शायद मेरे रोज का अनमने ढंग से तैयार हो कर ऑफिस जाने का दृश्य उसकी आँखों के सामने आ गया था।यूँ सुबह सुबह जग कर जल्दी से तैयार हो कर भागते हुए ऑफिस जाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा था।

"कितना अच्छा होता, अगर ऑफिस का काम घर से कर पाता"

 मैं अक्सर सोचा करता।आज बहुत दिनों बाद, शायद पहली बार, उसकी इस हिदायत भरे लहजे से मुझे हँसी आ रही थी उसे क्या पता था, कि मैं कितना उत्साहित और आतुर था इस मिलन के लिए। वैसे तो मिलने का समय तो ३ बजे का था, पर मेरी तैयारी तो सुबह से ही शुरू हो गई थी। दोपहर का खाना खा कर आराम करने के लिए बैठे ही थे कि, आशीष का फोन आ गया।
"आप लोग कितने देर में आ रहे हैं?"

अरे हां, आशीष के बारे में तो बताना ही भूल गया। मेरे दूर के वाले चाचाजी का लड़का, दूर का तो सिर्फ कहने का था पर असल में मेरी उससे बहुत पटती थी। एक बार रिश्ता हो जाए, तो हमारा साल में कम से कम एक बार तो मिलना तय था, आखिर लड़की वाले भी के ही तो थे। बस इसी बात की आस थी में वो भी लड़की वालों के साथ मुंबई आया था। हम करीब साढे तीन बजे वहाँ पहुँच गए थे। बात चीत और नाश्ता पानी के दौर के बाद आखिरकार मिलन की वो घड़ी आ ही गई।
लड़की को देखने के बाद लग रहा था, अगर जमाना १९वी सदी का होता, और केवल लड़की की फोटो देखकर शादी करनी पड़ती तो शायद आज तक मेरी शादी नहीं हुई होती, ऐसा लग रहा था कि रात भर बीबी से हुए झगड़े का सारा गुस्सा, स्टूडियो वाले ने लड़की की फोटो पर निकाला था। 
 
हम बिलकुल आमने सामने बैठे थे। मैनें धीरे से नजरें उठाकर देखा, हल्के हरे और प्याजी कलर के सलवार सूट में बड़ी प्यारी गुड़िया सी दिख रही थी। वो झुकी हुई नजरें, और हल्के गुलाबी कलर की लिपस्टिक से सजे होंठ उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे।कुल मिलाकर अपने आप में सिमटी, शरमायी और शायद थोड़ी सी घबरायी हुई सी साक्षात शरम और हया की मूरत नजर आ रही थी। अभी मैं ठीक से उसके मनभावन रूप का दिदार भी नहीं कर पाया था कि, फूफाजी जी की रोबदार आवाज ने जैसे मुझे सपनों की दुनिया से यथार्थ के धरातल पर ला पटका। फिर क्या, शुरू हो गया सवाल जबाब का सिलसिला, मै बड़े ही ध्यान से उसका जबाब सुन कर अपने सपनों की सुंदर, सुलझी और बेबाक लड़की से मैचिंग करता रहा। कुछ समय बाद मम्मी मेरी ओर देखकर बोली
" तुम्हें भी जो कुछ जानना पूछना है पूछ लो, शरमाओ मत"

"मेरे पास तो प्रश्नों की पुरी एक लिस्ट ही है, पर सबसे अंत मे पूछेंगे"

मेरा जबाब सुनकर सब हँस पड़े। लड़की थोड़ी सी डर गयी थी, मैंने चुपके से नोटिस किया।

"पहले आप हमसे जो जानना पूछना चाहते हैं, पूछ लीजिए"

मैंने कहा और उसे कम्फर्टेबल फील़ कराने की कोशिश की, वो कितना कम्फर्टेबल फील कर रही थी, उसका तो पता नहीं, पर हाँ उसकी छोटी और प्यारी सी स्माइल ने मुझे उसकी ओर दखने के लिए मज़बूर जरूर कर दिया था, शायद बड़े भैया ने भी उसकी असहजता भाँप ली थी, सो कहने लगे

"अरे हां, जो पूछना चाहती हो पूछ लो, इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। शरमाओ मत, सब अपने ही लोग हैं।"

पर उसने तो जैसे मौन व्रत ही रख लिया था, या फिर शायद वो इन सब बातों के लिए तैयार नहीं थी। उसने धीरे से अपनी मां की ओर देखा, कोई ईशारा ना पाकर चुपचाप नजरें झुकाए बैठी रही। कोई बात नहीं बनता देखकर मैंने ही बात शुरू की।उनके थोड़े ही सवालों के जवाब से मेरे दिमाग की ट्यूब लाइट ने ग्रीन सिग्नल देना शुरू कर दिया था, लिहाजा ४-५ सवाल जवाब के बाद ही मैं अपनी तरफ से श्योर हो चुका था, अब तो बस उसके मन की बात जानना था। इसी उधेड़बुन में था कि फूफाजी ने मेरे मन की बात कही

"चलिए, हम बड़े लोग दूसरे कमरे में चलते हैं, बच्चों को आपस में बात करने देना चाहिए।"

"अरे सारे बच्चे लोग तो है ना साथ में, तो चिंता की बात नहीं, चलिए चलते हैं।"
पापा ने लड़की की माँ को लगा सकुचाते देख कहा था। अब उनकी तरफ से प्रश्न पूछे जाने की आशा तो थी नहीं पर मुझे तो मेरा जवाब चाहिए था।
"क्या आप मुझे पुरी जिंदगी झेल सकेंगी?"
दिल तो किया इसी मजाकिया अंदाज में पूछ कर मौहौल को हल्का किया जाए,फिर सिचुएशन को देखा, बगल में बैठे लड़की के भाई को देखा और फिर लड़की की तरफ देखते ही इस आइडिया को दिमाग से झटकते हुए , लड़की की नजरों से नजरें मिलाते हुए सीधे तौर पर पूछ लिया.
"आपको किस तरह के लोग पसंद है, मेरा मतलब है, आपके होने वाले जीवनसाथी में क्या खूबी आपको सबसे अच्छी लगेगी?"
"मैंने कभी सोचा नहीं"
थोड़े देर की चुप्पी साधने के बाद, धीरे से उसने उत्तर दिया। पता था, कि कुछ ऐसा ही जवाब मिलेगा
साथ ही ये भी पता था कि शादी की बात शुरू होते ही, या शायद काफी पहले ही, ९० फिसदी
लड़कियाँ अपने होने वाले जीवनसाथी की कल्पना करने लग जाती हैं। शायद इंटरनेट पर या
किसी मेैगजीन में पढ़ा था, कौन सी पढ़ी हुई बात कब काम आ जाए, कोई नहीं बता सकता।
काफी मान मुनव्वल और समझाने के बाद मैं जान पाया था, कि उसके दिमाग का ट्यूब लाइट भी मेरे लिए ग्रीन सिग्नल दे रहा था। मेरी किस्मत की किश्ती को जैसे किनारा मिल गया था।
थोड़े ही देर मे सब आ गए, और लगभग पाँच मिनट बाद हम रूम से बाहर थे। बाहर निकलते ही मम्मी ने पूछा था

"कैसी लगी लड़की?"

मैंने स्माइल देते हुए हां मे सर हिला दिया। मां ने देरी ना करते हुए उन सब को घर चलने का निमंत्रण दे दिया। घर पर आते ही इधर उधर की बातें हुई। वैसे ना तो घर इतना बड़ा था, ना ही दिखाने लायक कुछ
स्पेशल था, फिर भी मम्मी ने सबको घर दिखा कर फारमलिटी पूरी कर ली थी।इन सब बातों में
ना जाने कब समय पंख लगा कर पार हुआ, पता ही नहीं चला। ऑफिस में समय तो इतना जल्दी समय पार नहीं होता कभी। अचानक घड़ी पर नजर पड़ने पर सोचने लगा था। शाम के ८ बज गए चुके थे और दिल कह रहा था कि काश अभी शाम के ५ ही बजे होते।पर काश तो काश ही होता है, खैर दिल की बातें दिल मे रखकर, मंथन काल लगाया तो पता चला फोन पर बुकिंग रिक्वेस्ट नहीं लेते। रविवार को वैसे भी छुट्टी का दिन होने से बहुत लाइन लगी होती है खाने के लिए वहाँ, और हो भी क्यूँ नहीं, हमारे यहाँ पर सबसे प्रसिद्ध रेसे्टोरेंट जो था।
मैं और भैया मंथन में टेबल बुक करने के लिए निकल गए। संयोग था, कि छोटे भाई का प्लान पता नहीं पर
वहाँ पर भी हम दोंनो टेबल के औपोजिट कार्नर पर बैठे थे। मुझे तो वैसे भी भुख नहीं थी, सो मैं नजरें
चुराकर उसे देखा जा रहा था। मैं चाह रहा था कि वक्त थम जाए, सेकंड मिनट में और मिनट घंटे मे बदल जाए पर मेरे साथ हो उल्टा रहा था, ऐसा लग रहा था कि घंटे मिनट में और मिनट सेकंड में बदल गए हैं।
समय जेट स्पीड से बीता जा रहा था पर मैं भी जैसे वक्त के साथ कौम्पीटिशन कर एक एक पल
से अपने यादों की डायरी भर लेना चाहता था। पर वक्त से भला कौन जीत पाया है, आखिरकार वो घड़ी आ गई, जब हमारे रास्ते अलग हो जाने थे। वो अपने परिवार के साथ होटेल जाने के लिए आटोरिक्शा में सवार हो गयी थी और हम सब घर जाने के लिए तैयार थे। औटो रिक्शा वाला भी जल्दी में ही था, सब को गुड नाइट विश करते ही आटो चल पड़ा। 
 
"ना जाने कब हर रोज की तरह शुरू होता दिन स्पेशल बन गया था"
सोचते हुए मेरे पैर भी मंद गति से घर की ओर बढ़ चले थे...