गुरुवार, 1 जून 2017

सैनिक

“पापा हमे भी ले चलो ना.. हम भी ललेगे दुछ्मनों छे…” कहते हुए चार साल की अन्नू दौड़ कर पापा से लिपट गयी।

“अगली बार जब तुम बड़ी हो जाओगी ना, तो तुम्हें भी साथ ले जाएंगे।” पापा ने प्यार से गोद में उठाते हुए प्यार से समझाने की कोशिश की थी।
“नहीं पापा, अब हम बले हो गए हैं। हम भी ललेगे दुछ्मनों छे…“

अपने खिलौने वाली बंदूक को आंखों के सामने नचाते हुए कहती हुई अन्नू मानो अपने बड़े और साहसी होने का परिचय दे रही थी।

“देख रही हो अंजलि , अपनी अन्नू कैसी बहादुरी की बातें कर रही है।”
अरविन्द ने अपनी पत्नी को आवाज लगाते हुए कहा।

“वादा करो, मैं रहूँ या ना रहूँ, तुम इसे सेना में आफिसर बनाओगी। “
सुनते ही अंजलि ने अपने हाथ अरविंद के होंठो पर रख दिए।

“अरे भाई, सैनिक की बीबी को इतनी भावुकता शोभा नहीं देती।“

हसकर कहते हुए अरविन्द ने सुमन के माथे पर स्नेह चुंबन अंकित कर दिया। अंजलि ने भी तिलक लगाकर मुस्कुराते हुए देश रक्षा के लिए विदा किया।

यूं तो वो अरविंद को पहले भी बहुत बार ड्यूटी ज्वॉइन करने के लिए विदा किया था, पर इस बार की बात ही अलग थी। छुट्टी पर आये दो दिन भी नहीं हुए कि घाटी में छिड़ा युद्ध की वजह सब की छुट्टी कैंसल कर दी गई थी। अरविंद को भी जाना पड़ा था।

अंजलि ने अरविंद को विदा तो कर दिया था लेकिन अरविन्द के कहे शब्द उसका पीछा नहीं छोड़ रहे थे। रोज ही पूजा और ध्यान के समय युद्ध समाप्ति की प्रार्थना करती अंजलि जब अधीर हो जाती तो न्यूज चैनल के सामने बैठे बड़ी बेसब्री से युद्ध समाप्ति वाले न्यूज की प्रतीक्षा करती। एक दिन अचानक शहीदों की लिस्ट में शामिल मेजर अरविंद की शहादत की खबर देख अंजलि जड़ सी हो गई थी। न्यूज एंकर की आवाज जैसे सुनाई ही ना दे रही हो। अरविंद की मां का तो रो कर बुरा हाल हो गया था।

दो दिनों बाद तिरंगे में लिपटे अरविंद को देख अंजलि फफक कर रो पड़ी थी। नन्हे अन्नू को तो ये पता भी नहीं चला था कि अब उसके पापा कभी नहीं आ पाएंगे।

हजारों की संख्या में उमड़े लोगों के बीच सैनिक सम्मान के साथ अरविंद को अंतिम विदाई दी गई थी।

“आपके और आपके परिवार के त्याग के लिए पुरा राष्ट्र कृतज्ञ है।”

स्वयं राष्ट्रपति ने मेजर अरविंद की शहादत पर परमवीर चक्र प्रदान करते हुए कहा था। लोगों की सहानुभूति और सरकारी सहायता से शुरूआत के दिन तो जैसे तैसे बीत गए थे पर दुख और उदासी ने समूचे घर पर डेरा जमा लिया था। जहाँ लोग दिवाली की खुशियां मना रहे थे वहीं अरविंद के बिना इस दिवाली की चमक एकदम फीकी पड़ गई थी।

पापा कब आएंगे मम्मी… “ पूछते हुए अन्नू का रो रो कर बुरा हाल हो जाता। अंजलि के पास अन्नू के इस प्रश्न का कोई जबाव नहीं होता। अपने दुखों के बवंडर को अपने अंदर समेट उसे चाकलेट व खिलोने से बहलाने की कोशिश करती। कुछ सालों के बाद तो अन्नू ने पूछना भी बंद कर दिया था, शायद उसे धीरे धीरे पता चल गया था कि उसके पापा अब उसके पास कभी नहीं आ पाएंगे।

“एक बार फिर से विचार कर ले। फौज में अगर कुछ हो गया तो अकेले कैसे जी पाएगी ए अंजलि ?”

अंजलि की मां के कहने पर अंजलि की बचपन की सहेली काजल ने स्पष्ट शब्दों में समझाना चाहा था।

“प्रेम समर्पण है। अकेले जीने का भय मुझे अरविंद से दूर नहीं कर सकता है। और अगर सब ऐसे ही सोचते रहते तो आज कोई सेना में शामिल नहीं होता। न जाने कितने ही बहनों के भाई, मां के लाल और पत्नियों के पति सरहद की सुरक्षा के लिए तैनात हैं, इसलिए आज हमसब सुरक्षित हैं।”

कहते हुए अंजलि ने होंठ भींच लिए।

“लगता है, तेरे अंदर का फिलास्फर फिर से जग गया है, एक बार फिर से सोच ले, मैं तो ऐसे जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती।”

“देख लेना, अगर ऐसा कुछ हुआ तो भी अरविंद के यादों के साथ मैं जी लूंगी। “

“अरविंद बड़ा ही भाग्यशाली है जो उसे तेरे जैसा जीवन साथी मिल रहा है”

अंजलि को दृढ़ता से अपनी बात कहते देख काजल ने कहा।

“तू कहे तो अरविंद से कहकर तेरे लिए भी कोई भाग्यशाली ढूंढ लेते हैं।” कहते हुए अंजलि मुस्कराने लगी।

“ना बाबा ना, हम तो ऐसे ही ठीक हैं।”

कहते हुए दोनों सहेलियाँ हंस पड़ी थी। अंजलि को उसकी ही कही हुई बातों ने उसे जीने का नया तरीका सीखा दिया था। अन्नू को फौज में आफिसर बनाकर पति की अंतिम इच्छा पूरा करना ही जैसे अब उसके जीवन का आधार बन गया था।

“ फ्लाइंग ऑफिसर अनुपमा बरनवाल रिपोर्टिंग।”

अनुपमा की सधी हुई आवाज़ अंजलि को अतीत के अंधियारे से वर्तमान के उजियारे में खींच लाने के लिए काफी था।

इन दो सालों में अन्नू के व्यक्तित्व में और निखार आ गया था। वो हिरनी सी बड़ी बड़ी आंखों के के बीच छोटी सी काली बिंदी और इंडियन एयर फोर्स की नीली वर्दी ने अन्नू की खूबसूरती में चार चांद लगा दिए। करीने से बंधे बालों के जूड़े मानों अनुशासन और संयम में बंधे रहने का संदेश दे रहे हों। अंजलि के रूप रंग और अरविंद के साहस और व्यक्तित्व की प्रतिलिपि अनुपमा आज पूरे दो साल बाद अपनी ट्रेनिंग कम्प्लीट कर घर लौटी थी।

शेष अगले अंक में…