गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

यादों के पन्ने

हर दिन की तरह आज की सुबह की शुरुआत भी लेट से हुई थी।उठते ही पापा की आवाज कानों में सुनाई दी
"अरे! आज तो जलदी उठ जाओ".

पीछे से छोटे भाई ने भी सुर में सुर मिलाया,

"कितना आलसी है। अरे जल्दी से तैयार हो जाओ, लड़की देखने नहीं जाना है?"

आँखें मलता हुआ मैं बिस्तर छोड़कर उठा ही था कि अपने घर के सोनू निगम का गाना सुनाई दिया मुझे देखते ही गाना बदलकर कब लता मंगेशकर बन गया पता ही नहीं चला।
"आजकल पाँव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे"
पर आज तो उसका यूँ चिढ़ाना भी अच्छा लग रहा था।ऐसा नहीं है, कि हम पहली बार किसी लड़की को देखने जा रहे थे, पर इस बार की बात ही अलग थी। खैर दिल के उमंग को दिमाग रूपी जेल में कैद कर, मैने धरती पर पैर रखे ही थे कि भाई साहब ने अपनी सख्त हिदायत दे डाली।
"दाढ़ी वाढ़ी बना लेना, और अच्छे से तैयार हो कर चलना और हाँ जूते जरूर पॉलिश कर लेना "
शायद मेरे रोज का अनमने ढंग से तैयार हो कर ऑफिस जाने का दृश्य उसकी आँखों के सामने आ गया था।यूँ सुबह सुबह जग कर जल्दी से तैयार हो कर भागते हुए ऑफिस जाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा था।

"कितना अच्छा होता, अगर ऑफिस का काम घर से कर पाता"

 मैं अक्सर सोचा करता।आज बहुत दिनों बाद, शायद पहली बार, उसकी इस हिदायत भरे लहजे से मुझे हँसी आ रही थी उसे क्या पता था, कि मैं कितना उत्साहित और आतुर था इस मिलन के लिए। वैसे तो मिलने का समय तो ३ बजे का था, पर मेरी तैयारी तो सुबह से ही शुरू हो गई थी। दोपहर का खाना खा कर आराम करने के लिए बैठे ही थे कि, आशीष का फोन आ गया।
"आप लोग कितने देर में आ रहे हैं?"

अरे हां, आशीष के बारे में तो बताना ही भूल गया। मेरे दूर के वाले चाचाजी का लड़का, दूर का तो सिर्फ कहने का था पर असल में मेरी उससे बहुत पटती थी। एक बार रिश्ता हो जाए, तो हमारा साल में कम से कम एक बार तो मिलना तय था, आखिर लड़की वाले भी के ही तो थे। बस इसी बात की आस थी में वो भी लड़की वालों के साथ मुंबई आया था। हम करीब साढे तीन बजे वहाँ पहुँच गए थे। बात चीत और नाश्ता पानी के दौर के बाद आखिरकार मिलन की वो घड़ी आ ही गई।
लड़की को देखने के बाद लग रहा था, अगर जमाना १९वी सदी का होता, और केवल लड़की की फोटो देखकर शादी करनी पड़ती तो शायद आज तक मेरी शादी नहीं हुई होती, ऐसा लग रहा था कि रात भर बीबी से हुए झगड़े का सारा गुस्सा, स्टूडियो वाले ने लड़की की फोटो पर निकाला था। 
 
हम बिलकुल आमने सामने बैठे थे। मैनें धीरे से नजरें उठाकर देखा, हल्के हरे और प्याजी कलर के सलवार सूट में बड़ी प्यारी गुड़िया सी दिख रही थी। वो झुकी हुई नजरें, और हल्के गुलाबी कलर की लिपस्टिक से सजे होंठ उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे।कुल मिलाकर अपने आप में सिमटी, शरमायी और शायद थोड़ी सी घबरायी हुई सी साक्षात शरम और हया की मूरत नजर आ रही थी। अभी मैं ठीक से उसके मनभावन रूप का दिदार भी नहीं कर पाया था कि, फूफाजी जी की रोबदार आवाज ने जैसे मुझे सपनों की दुनिया से यथार्थ के धरातल पर ला पटका। फिर क्या, शुरू हो गया सवाल जबाब का सिलसिला, मै बड़े ही ध्यान से उसका जबाब सुन कर अपने सपनों की सुंदर, सुलझी और बेबाक लड़की से मैचिंग करता रहा। कुछ समय बाद मम्मी मेरी ओर देखकर बोली
" तुम्हें भी जो कुछ जानना पूछना है पूछ लो, शरमाओ मत"

"मेरे पास तो प्रश्नों की पुरी एक लिस्ट ही है, पर सबसे अंत मे पूछेंगे"

मेरा जबाब सुनकर सब हँस पड़े। लड़की थोड़ी सी डर गयी थी, मैंने चुपके से नोटिस किया।

"पहले आप हमसे जो जानना पूछना चाहते हैं, पूछ लीजिए"

मैंने कहा और उसे कम्फर्टेबल फील़ कराने की कोशिश की, वो कितना कम्फर्टेबल फील कर रही थी, उसका तो पता नहीं, पर हाँ उसकी छोटी और प्यारी सी स्माइल ने मुझे उसकी ओर दखने के लिए मज़बूर जरूर कर दिया था, शायद बड़े भैया ने भी उसकी असहजता भाँप ली थी, सो कहने लगे

"अरे हां, जो पूछना चाहती हो पूछ लो, इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। शरमाओ मत, सब अपने ही लोग हैं।"

पर उसने तो जैसे मौन व्रत ही रख लिया था, या फिर शायद वो इन सब बातों के लिए तैयार नहीं थी। उसने धीरे से अपनी मां की ओर देखा, कोई ईशारा ना पाकर चुपचाप नजरें झुकाए बैठी रही। कोई बात नहीं बनता देखकर मैंने ही बात शुरू की।उनके थोड़े ही सवालों के जवाब से मेरे दिमाग की ट्यूब लाइट ने ग्रीन सिग्नल देना शुरू कर दिया था, लिहाजा ४-५ सवाल जवाब के बाद ही मैं अपनी तरफ से श्योर हो चुका था, अब तो बस उसके मन की बात जानना था। इसी उधेड़बुन में था कि फूफाजी ने मेरे मन की बात कही

"चलिए, हम बड़े लोग दूसरे कमरे में चलते हैं, बच्चों को आपस में बात करने देना चाहिए।"

"अरे सारे बच्चे लोग तो है ना साथ में, तो चिंता की बात नहीं, चलिए चलते हैं।"
पापा ने लड़की की माँ को लगा सकुचाते देख कहा था। अब उनकी तरफ से प्रश्न पूछे जाने की आशा तो थी नहीं पर मुझे तो मेरा जवाब चाहिए था।
"क्या आप मुझे पुरी जिंदगी झेल सकेंगी?"
दिल तो किया इसी मजाकिया अंदाज में पूछ कर मौहौल को हल्का किया जाए,फिर सिचुएशन को देखा, बगल में बैठे लड़की के भाई को देखा और फिर लड़की की तरफ देखते ही इस आइडिया को दिमाग से झटकते हुए , लड़की की नजरों से नजरें मिलाते हुए सीधे तौर पर पूछ लिया.
"आपको किस तरह के लोग पसंद है, मेरा मतलब है, आपके होने वाले जीवनसाथी में क्या खूबी आपको सबसे अच्छी लगेगी?"
"मैंने कभी सोचा नहीं"
थोड़े देर की चुप्पी साधने के बाद, धीरे से उसने उत्तर दिया। पता था, कि कुछ ऐसा ही जवाब मिलेगा
साथ ही ये भी पता था कि शादी की बात शुरू होते ही, या शायद काफी पहले ही, ९० फिसदी
लड़कियाँ अपने होने वाले जीवनसाथी की कल्पना करने लग जाती हैं। शायद इंटरनेट पर या
किसी मेैगजीन में पढ़ा था, कौन सी पढ़ी हुई बात कब काम आ जाए, कोई नहीं बता सकता।
काफी मान मुनव्वल और समझाने के बाद मैं जान पाया था, कि उसके दिमाग का ट्यूब लाइट भी मेरे लिए ग्रीन सिग्नल दे रहा था। मेरी किस्मत की किश्ती को जैसे किनारा मिल गया था।
थोड़े ही देर मे सब आ गए, और लगभग पाँच मिनट बाद हम रूम से बाहर थे। बाहर निकलते ही मम्मी ने पूछा था

"कैसी लगी लड़की?"

मैंने स्माइल देते हुए हां मे सर हिला दिया। मां ने देरी ना करते हुए उन सब को घर चलने का निमंत्रण दे दिया। घर पर आते ही इधर उधर की बातें हुई। वैसे ना तो घर इतना बड़ा था, ना ही दिखाने लायक कुछ
स्पेशल था, फिर भी मम्मी ने सबको घर दिखा कर फारमलिटी पूरी कर ली थी।इन सब बातों में
ना जाने कब समय पंख लगा कर पार हुआ, पता ही नहीं चला। ऑफिस में समय तो इतना जल्दी समय पार नहीं होता कभी। अचानक घड़ी पर नजर पड़ने पर सोचने लगा था। शाम के ८ बज गए चुके थे और दिल कह रहा था कि काश अभी शाम के ५ ही बजे होते।पर काश तो काश ही होता है, खैर दिल की बातें दिल मे रखकर, मंथन काल लगाया तो पता चला फोन पर बुकिंग रिक्वेस्ट नहीं लेते। रविवार को वैसे भी छुट्टी का दिन होने से बहुत लाइन लगी होती है खाने के लिए वहाँ, और हो भी क्यूँ नहीं, हमारे यहाँ पर सबसे प्रसिद्ध रेसे्टोरेंट जो था।
मैं और भैया मंथन में टेबल बुक करने के लिए निकल गए। संयोग था, कि छोटे भाई का प्लान पता नहीं पर
वहाँ पर भी हम दोंनो टेबल के औपोजिट कार्नर पर बैठे थे। मुझे तो वैसे भी भुख नहीं थी, सो मैं नजरें
चुराकर उसे देखा जा रहा था। मैं चाह रहा था कि वक्त थम जाए, सेकंड मिनट में और मिनट घंटे मे बदल जाए पर मेरे साथ हो उल्टा रहा था, ऐसा लग रहा था कि घंटे मिनट में और मिनट सेकंड में बदल गए हैं।
समय जेट स्पीड से बीता जा रहा था पर मैं भी जैसे वक्त के साथ कौम्पीटिशन कर एक एक पल
से अपने यादों की डायरी भर लेना चाहता था। पर वक्त से भला कौन जीत पाया है, आखिरकार वो घड़ी आ गई, जब हमारे रास्ते अलग हो जाने थे। वो अपने परिवार के साथ होटेल जाने के लिए आटोरिक्शा में सवार हो गयी थी और हम सब घर जाने के लिए तैयार थे। औटो रिक्शा वाला भी जल्दी में ही था, सब को गुड नाइट विश करते ही आटो चल पड़ा। 
 
"ना जाने कब हर रोज की तरह शुरू होता दिन स्पेशल बन गया था"
सोचते हुए मेरे पैर भी मंद गति से घर की ओर बढ़ चले थे...











5 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तम जी, मुझे कम्प्यूटर का अधिक ज्ञान नहीं है. आपकी कहानी पर अपने विचार दी थे, पता नहीं आप तक पहुंचे या नहीं.आपमें एक कुशल कहानीकार है. कहानी की थीम, भाषा-शैली बहुत अच्छी है. शुरू से कहानी अंत जानने के लिए बांधे रखती है. एक सुझाव है, कहानी का अंत अप्रत्याशित होना रोचकता बढ़ा देता, अगर नायिका कहती, उसका किसी के साथ प्रेम है तो अंत अधिक अच्छा होता, पर यह बस मेरा सुझाव है. पहली कहानी के लिए बधाई, लिखते रही. सस्नेह, पुष्पा सक्सेना.

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    1. आप के महत्वपूर्ण विचार के लिए ह्रदयपूर्वक आभार| हमें लगा नहीं था, आपकी समीक्षा इतनी जल्दी मुझे प्राप्त होगी | ऐसा लग रहा है जैसे मुझे आपका आशीर्वाद मिल गया है, प्रयत्न करूँगा और अच्छी कहानियां लिख सकूँ | आप आपके छोटे से छोटे प्रशंसकों का भी बहुत ध्यान रखती है, ये बात दिल को छू गईं | बहुत बहुत धन्यवाद |

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  2. बहुत ही उम्दा लेखनी। इतनी सरल भासा और आसान सब्दों में आपने बहुत अच्छे से अपने जीवनसाथी से हुई पहली मुलाकात की दास्ताँ बयान की है, बहुत ही अच्छी लगी।

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